Saturday, 7 October 2017

राजस्थान में उद्योग (Industry in Rajasthan)

राजस्थान में उद्योग (Industry in Rajasthan)
  • राजस्थान में सर्वाधिक औद्योगिक इकाइयां जयपुर जिले में तथा न्यूनतम जैसलमेर जिले में स्थित है।
  • राजस्थान के 8 जिले यथा- जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, पाली, भीलवाड़ा, अलवर, अजमेर तथा गंगानगर में राज्य की 75 प्रतिशत फैक्ट्रियां तथा रोजगार का 75.2 प्रतिशत अंश पाया जाता है।
  • राजस्थान में जैसलमेर, बाड़मेर, चुरू व सिरोही जिले शुन्य उद्योग जिले कहलाते हैं।
प्रमुख उद्योग (Important Industries) 
1. सूती वस्त्र उद्योग (Cotton Textile Industry)-
  • अविभाजित भारत में ढाका की मलमल विश्व प्रसिद्ध थी।
  • सूती वस्त्र उद्योग राजस्थान का सबसे प्राचीन संगठित उद्योग है।
  • 1949 में राजस्थान में 7 सूती वस्त्र मिले थी, जो बढ़कर अब 38 हो गई है।
  • गंगानगर में विश्व बैंक की सहायता से सहकारी क्षेत्र में काटन काम्प्लेक्स की स्थापना की गई है।
  • वर्तमान में राजस्थान में 3 सार्वजनिक क्षेत्र (दो ब्यावर व एक विजयनगर में) तथा 3 सहकारी कताई मिलें (गुलाबपुरा, गंगापुर व हनुमानगढ़) व अन्य निजी क्षेत्र की मिलें कार्यरत हैं।
  • राज्य में सर्वप्रथम 1889 में ब्यावर में निजी क्षेत्र कि दी कृष्णा मिल्स लिमिटेड कि स्थापना सेठ दामोदर दास व्यास ने कि |
  • इसके पश्चात् दूसरी मिल भी 1906 में ब्यावर में ही एडवर्ड मिल्स लिमिटेड के नाम से खोली गई |

Friday, 29 September 2017

राजस्थान में कृषि एवं फसलें (Agriculture and Crops in Rajasthan)



राजस्थान में कृषि एवं फसलें (Agriculture and Crops in Rajasthan)
  • स्वतंत्रता से पूर्व राजस्थान की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था।
  • राजस्थान की कुल कार्यशील जनसंख्या का लगभग 70 प्रतिशत रोजगार की दृष्टि से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से कृषि एवं पशुपालन पर निर्भर है।
  • राजस्थान राज्य की सम्पूर्ण आय का लगभग 52 प्रतिशत कृषि एवं इससे संबंधित क्षेत्रों से होती है।
  • राजस्थान में भारत के कुल कृषिगत क्षेत्रफल का 10.2 प्रतिशत है।
  • राजस्थान के कुल कृषिगत क्षेत्रफल का 2/3 भाग खरीफ के मौसम में बोया जाता है।
  • राजस्थान के कुल कृषि क्षेत्रफल का लगभग 32.4 प्रतिशत भाग सिंचित है।
खाद्यान्न फसलें (Cereals)
  • राजस्थान में खाद्यान्नों में गेहूं, जौ, चावल, मक्का, बाजरा, ज्वार, रबी एवं खरीफ की दलहन फसलें शामिल हैं।
1. गेहूं (Wheat)
  • राजस्थान का गेहूं के उत्पादन में भारत में चौथा स्थान है। भारत के कुल गेहूं उत्पादन का 8 प्रतिशत राज्य में होता है।
  • राजस्थान में गेहूं सर्वाधिक मात्रा में एवं सर्वाधिक सिंचित क्षेत्र में उत्पादित होने वाली फसल है जो रबी की फसल है।
  • राज्य में सर्वाधिक क्षेत्र में खाद्यान्न फसल के रूप में गेहूं बोया जाता है।
  • गेहूं को बोये जाने के समय तापमान कम से कम 8° से 10° सें. तक होना चाहिए तथा पकने के समय तापमान 15° से 20° सें. तक होना चाहिए।
  • 50 सेमी. से 100 सेमी. के बीच वर्षा की आवश्यकता होती है।
  • राजस्थान में साधारण गेहूं (ट्रीटीकम) एवं मेकरोनी गेहूं (लाल गेहूं) सर्वाधिक पैदा होता है।
  • गेहूं उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र पूर्वी एवं दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान के जयपुर, अलवर, कोटा, गंगानगर, हनुमानगढ़ और सवाई माधोपुर जिले हैं।
  • राजस्थान में सर्वाधिक गेहूं गंगानगर जिले में उत्पादित होता है इसलिए गंगानगर जिला अन्न का भण्डार कहलाता है।
  • नाइट्रोजन युक्त दोमट मिट्टी, महीन काँप मिट्टी व चीका प्रधान मिट्टी गेहूं उत्पादन हेतु उपयुक्त होती है। मिट्टी pH मान 5 से 7.5 के मध्य होना चाहिए।
  • राजस्थान में दुर्गापुरा-65, कल्याण सोना, मैक्सिकन, सोनेरा, शरबती, कोहिनूर, सोनालिका, गंगा सुनहरी, मंगला, कार्निया-65, लाल बहादुर, चम्बल-65, राजस्थान-3077 आदि किस्में बोई जाती हैं।
  • गेहूं में छाछ्या, करजवा, रतुआ, चेपा रोग पाए जाते हैं
  • इण्डिया मिक्स- गेहूं, मक्का व सोयाबीन का मिश्रित आटा।
  • गौचणी- गेहूं, जौ, चना का मिश्रित आटा।
2. जौ(Barley)-
  • राजस्थान में जौ उत्पादन क्षेत्रफल लगभग 2.5 लाख हेक्टेयर है।
  • जौ उत्पादन में राजस्थान का उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान है।
  • भारत के कुल उत्पादन का 1/4 भाग राजस्थान में पैदा होता है।
  • जौ शीतोष्ण जलवायु का पौधा है तथा रबी की फसल है।
  • जौ की बुवाई के समय लगभग 10° सें. तापमान की आवश्यकता है तथा काटते समय 20° से 22° सेन्टीग्रेड तापमान होना चाहिए।
  • जौ के लिए शुष्क और बालू मिश्रित काँप मिट्टी उपयुक्त रहती है।
  • जौ की प्रमुख किस्में ज्योति, RS-6, राजकिरण, R.D.- 2503, RS-6, मोल्वा आदि है।
  • राजस्थान में प्रमुख जौ उत्पादन जिले जयपुर (सर्वाधिक), उदयपुर, अलवर, भीलवाड़ा व अजमेर हैं।
  • जौ का उपयोग मिसी रोटी बनाने, मधुमेह रोगी के उपचार, शराब व बीयर बनाने, माल्ट उद्योग में किया जाता है।
3. बाजरा (Bajra)-
  • बाजरा का जन्म अफ्रीका को माना जाता है।
  • विश्व का सर्वाधिक बाजरा भारत में पैदा होता है।
  • बाजरे के उत्पादन एवं क्षेत्रफल में राजस्थान का भारत में प्रथम स्थान है।
  • राजस्थान देश का लगभग एक तिहाई बाजरा उत्पादित करता है।
  • बाजरा राजस्थान में सर्वाधिक क्षेत्र पर बोई जाने वाली खरीफ की फसल है।
  • बाजरा के लिए शुष्क जलवायु उपयुक्त रहती है। बाजरे की बुवाई मई, जून या जुलाई माह में होती है।
  • बाजरे की बुवाई करते समय तापमान 35° से 40° सेन्टीग्रेड तक होना चाहिए।
  • बाजरे के लिए 50 सेमी. से कम वर्षा उपयुक्त रहती है। बाजरा बलुई, बंजर, मरुस्थलीय तथा अर्द्ध काँपीय मिट्टी में पैदा होता है।
  • बाजरा की प्रमुख किस्में ICTP-8203, WCC-75, राजस्थान-171, RHB-30, RHB-58, RHB-911, राजस्थान बाजरा चरी-2 है।
  • बाजरा को जोगिया, ग्रीन ईयर, कण्डुआ, सूखा रोग नुकसान पहुँचाते है।
  • बाजरे की फसल के गोंद (अरकट) लगने से यह ज़हरीला हो जाता है जो गर्भपात और उल्टी-दस्त का कारण बन जाता है।
  • बाजरा के प्रमुख उत्पादक जिले बाड़मेर, जोधपुर, नागौर, जयपुर, बीकानेर, करौली, जैसलमेर आदि है।
  • केन्द्र सरकार द्वारा अखिल भारतीय समन्वित बाजरा सुधार परियोजना व मिलेट डायरेक्टोरेट को क्रमशः पूना व चैन्नई से जोधपुर व जयपुर स्थानांतरित किया गया है। दो नए केन्द्र बीकानेर एवं जोधपुर में स्थापित किए गए हैं।
3. मक्का (Maize)
  • भारत के कुल मक्का उत्पादन का 1/8 भाग राजस्थान में उत्पादित होता है।
  • मक्का मुख्यत: खरीफ की फसल है।
  • उष्ण एवं आर्द्र जलवायु मक्का के उपयुक्त रहती है।
  • मक्का की बुवाई करते समय औसत तापमान 21° से 27° सेन्टीग्रेड तक होना चाहिए।
  • मक्का के लिए 50 सेमी. से 80 सेमी. तक वर्षा की आवश्यकता रहती है।
  • मक्का के लिए नाइट्रोजन व जीवांशयुक्त मिट्टी, दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त रहती है।
  • राजस्थान में गेहूं, चावल, ज्वार के बाद खाद्यान्न में मक्का का चौथा स्थान है।
  • मक्का की प्रमुख किस्में माही कंचन, माही धवल, सविता (संकर किस्म), नवजोत, गंगा-2, गंगा-11, अगेती-76, किरण आदि है।
  • राजस्थान में मक्का के प्रमुख उत्पादक जिले उदयपुर (सर्वाधिक), चितौड़गढ़, भीलवाड़ा व बांसवाड़ा है।
  • मक्का की हरी पत्तियों से साईलेज चारा बनाया जाता है।
  • कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मक्के के पौधे का 80 प्रतिशत विकास रात के समय होता है।
  • बांसवाड़ा जिले के बोरवर गाँव में कृषि अनुसंधान केन्द्र संचालित है। दक्षिणी राजस्थान में रबी के मौसम में भी मक्का की खेती को किसानों में लोकप्रिय बनाने का श्रेय बांसवाड़ा कृषि अनुसंधान केन्द्र को दिया जाता हैै। इस केन्द्र ने मक्का की संयुक्त किस्में माही कंचन एवं माही धवल विकसित की है।
  • मक्का के दानों से मांडी (स्टार्च), ग्लूकोज तथा एल्कोहल तैयार किया जाता है।
  • मक्का मेवाड़ क्षेत्र का प्रमुख खाद्यान्न हैं।
 5. चावल (Rice)-
  • चावल भारत में सर्वाधिक मात्रा में उत्पादित होने वाला खाद्यान्न है। भारत में सर्वाधिक चावल उत्पादन पश्चिम बंगाल में होता है।
  • चावल उष्ण कटिबंधीय पौधा है। इसके लिए  20° से 27° सेन्टीग्रेड तक तापमान एवं 125 से 200 सेमी. वार्षिक वर्षा की आवश्यकता रहती हैं।
  • चावल के लिए काँपीय, दोमट, चिकनी मिट्टी उपयुक्त रहती है।
  • वर्तमान में राजस्थान में जापानी पद्धति से चावल की खेती की जाती है।
  • चावल की प्रमुख किस्में कावेरी, जया, परमल, चम्बल, गरडा़बासमती, NP-130, BK-190, T-29, सफेदा एवं लकडा़, माही सुगंधा (कृषि अनुसंधान केन्द्र, बांसवाड़ा द्वारा विकसित) है।
  • राजस्थान में प्रमुख चावल उत्पादक जिले बांसवाड़ा, बूंदी, हनुमानगढ़, बारां, कोटा, उदयपुर और गंगानगर हैं।
  • राजस्थान का लगभग आधा चावल उत्पादन केवल दो जिलों बांसवाड़ा व हनुमानगढ़ में होता है।
  • राजस्थान में चावल का प्रति हैक्टेयर उत्पादन सर्वाधिक हनुमानगढ़ जिले में होता है।
6. ज्वार (Jowar)-
  • ज्वार उष्ण कटिबंधीय खरीफ की फसल है तथा इसके लिए औसत तापमान 20° से 32° सेन्टीग्रेड तथा 50 से 60 सेमी. वार्षिक वर्षा उपयुक्त रहती है।
  • ज्वार की बुवाई हेतु दोमट मिट्टी अथवा गहरी या मध्य काली मिट्टी उपयुक्त रहती है।
  • राजस्थान में ज्वार की दो प्रमुख किस्में- राजस्थान चरी-1 एवं चरी-2 चारे के लिए तैयार की गई है।
  • राजस्थान में प्रमुख ज्वार उत्पादक जिले अजमेर, उदयपुर, भीलवाड़ा, भरतपुर, कोटा, बूंदी, झालावाड़, सवाई माधोपुर, अलवर, जयपुर व टोंक हैं।
  • ज्वार को सोरगम व गरीब की रोटी भी कहा जाता है।
  • राजस्थान में ज्वार का क्षेत्रफल देश के कुल क्षेत्रफल का 10 प्रतिशत है।
 7. दलहन (Pulses)-
  • राज्य में रबी मौसम में चना, मटर व मसूर तथा खरीफ के मौसम में मोठ, उड़द, मूंग, चवला व अरहर प्रमुख दलहनी फसलें हैं।
  • राजस्थान में दलहनी फसलें 18 प्रतिशत क्षेत्रफल पर बोई जाती है।
  • दलहन का उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से 1974-75 में केन्द्र संचालित दलहन विकास योजना शुरू की गई।
  • राजस्थान में दालों का सर्वाधिक उत्पादन जोधपुर जिले में होता है।
  • देश में दलहन उत्पादन की दृष्टि से राजस्थान का छठा स्थान है।
  • राजस्थान में सर्वाधिक अरहर व तुअर- बांसवाड़ा, मूंग- नागौर, मोठ- बाड़मेर, उड़द- चितौड़गढ़, चवला- सीकर, मसूर- भरतपुर तथा मटर-पनीर जयपुर जिले में उत्पादित होती है।
  • चना- भारत में चने के कुल क्षेत्रफल का 22.78 प्रतिशत क्षेत्र राजस्थान में हैं।
    उत्तरप्रदेश के बाद चना उत्पादक में राजस्थान का दूसरा स्थान है।
    क्षेत्रफल की दृष्टि से बाजरा, गेहूं के बाद चने को तीसरा स्थान प्राप्त है।
    राजस्थान में राष्ट्रीय औसत से चने का उत्पादन प्रति हैक्टेयर अधिक होता है जबकि अन्य लगभग सभी फसलों का औसत उत्पादन राष्ट्रीय औसत से कम होता है।
    राजस्थान में कुल दलहनी फसलों में चने का उत्पादन सर्वाधिक होता है।
    रबी की दलहनी फसलों में राज्य में सर्वाधिक क्षेत्रफल पर चना बोया जाता है
    चना की बुवाई के समय तापमान लगभग 20° सेन्टीग्रेड एवं काटते समय तापमान 30° से 35° सेन्टीग्रेड तक होना चाहिए।
    चना के लिए हल्की बलुई मिट्टी उपयुक्त रहती है तथा 50 से 85 सेमी. वार्षिक वर्षा की आवश्यकता रहती है।
    चना की प्रमुख किस्मेंRSG-2, BJ-209, GNG-16, RS-10, वरदान, सम्राट, काबुली आदि है।
    राजस्थान में प्रमुख चना उत्पादक जिले गंगानगर, बीकानेर, सीकर, चुरू, हनुमानगढ़ आदि है।
    चना का उपयोग दाल बनाने, जानवरों को खिलाने तथा माल्ट उद्योग में किया जाता है।
    गेहूं व जौ के साथ चना बोना स्थानीय भाषा में गोचनी या बेझड़ कहलाता है।
  • मोठ- खरीफ की दलहन फसलों में मोठ सर्वाधिक भू-भाग पर बोया जाता है। मोठ के उत्पादन में भारत में राजस्थान का पहला स्थान है। दलहनी फसलों में सर्वाधिक सूखा सहन करने वाली फसल मोठ है।
  • उड़द- उड़द उष्ण कटिबंधीय पौधा है। इसके लिए दोमट तथा भारी दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है।
व्यापारिक फसलें (Commercial Crops)
1. गन्ना ((Sugarcane)-
  • गन्ना एक प्रमुख व्यापारिक फसल है, यह मूल रूप से भारतीय पौधा है।
  • विश्व में भारत का गन्ना उत्पादन में प्रथम स्थान है।
  • गन्ने की फसल एक बार बुवाई करने पर तीन साल तक उत्पादन देती है।
  • भारत में सर्वाधिक गन्ना उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश (देश का 40 प्रतिशत) है जबकि राजस्थान में भारत के कुल उत्पादन का लगभग 0.04 प्रतिशत होता है।
  • गन्ने की खेती के लिए 15° से 24° सेन्टीग्रेट तापमान तथा 100 से 200 सेमी. वार्षिक वर्षा की आवश्यकता रहती है।
  • राजस्थान में गन्ना बूंदी (सर्वाधिक), उदयपुर, चितौड़गढ़ व गंगानगर जिलों में उत्पादित होता है।
  • गन्ने में लाल सड़न रोग, पाइरिला, कण्डवा, रेडक्रास आदि रोग लग जाते हैं।
2. कपास ( Cotton)-
  • कपास मूलतः भारतीय पौधा है। इसका विकास सिंधु घाटी सभ्यता में हुआ।
  • राजस्थान का कपास के उत्पादन में देश में 8वां स्थान है। कपास उत्पादन की दृष्टि से भारत का विश्व में दूसरा स्थान है।
  • कपास के लिए 20° से 30° सेन्टीग्रेट तापमान, 50 से 100 सेमी. वार्षिक वर्षा तथा नमी युक्त चिकनी मिट्टी या काली मिट्टी उपयुक्त रहती है।
  • राजस्थान में कपास को ग्रामीण भाषा में बणीया कहा जाता है। इसे सफेद सोना भी कहा जाता है।
  • कपास की बुवाई मई-जून के महीने में की जाती है।
  • ज्यादा ठंड से कपास की फसल को बालबीविल कीड़ा नुकसान पहुँचाता है।इसकी रोग प्रतिरोधक फसल भिण्डी होती है।
  • राजस्थान में कपास गंगानगर (सर्वाधिक), हनुमानगढ़, अजमेर, भीलवाड़ा, झालावाड़, चितौड़गढ़, उदयपुर, पाली, कोटा, बूंदी व झालावाड़ जिलों में उत्पादित होता है।
  • कपास की एक गांठ का वजन 170 किलोग्राम होता है।
  • राज्य में में बोई जाने वाली कपास के विभिन्न प्रकार :- 1. नरमा - श्रीगंगानगर व हनुमानगढ़ में बोयी जाती है। 2.अमेरिकन कपास - लम्बे रेशे वाली वाली कपास गंगानगर व हनुमानगढ़ जिलों में सर्वाधिक होती है। 3.मालवी कपास- यह कपास कोटा, बूंदी, झालावाड़ व टोंक जिलों में बोयी जाती है। 4.देशी कपास- यह कपास उदयपुर, चितौड़गढ़ व बांसवाड़ा जिलों में सर्वाधिक बोयी जाती है। 3.मरूविकास (Raj.H.H.-16)- राजस्थान में कपास की पहली संकर किस्म। 6.बी.टी. कपास- बेसिलस थ्रेजेन्सिस (विशेष क्रिस्टल प्रोटीन बनाने वाला) का बीज में प्रत्यारोपण। इसमें जैव-अभियांत्रिकी तकनीक से बीज की संरचना में डी.एन.ए. की स्थिति को प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और टाक्सीकेट्स में बदला जाता है।
  • राजस्थान के जैसलमेर व चुरू जिलों में कपास का उत्पादन नहीं होता है।
3.तंबाकू(Tobacco)-
  • तम्बाकू का पौधा भारत में सर्वप्रथम 1508 में पुर्तगालियों द्वारा लाया गया।
  • तम्बाकू के लिए 20° से 35° सेन्टीग्रेड तापमान तथा 50 से 100 सेमी. वार्षिक वर्षा की आवश्यकता रहती है।
  • तम्बाकू एक उष्ण कटिबंधीय पौधा है।
  • राजस्थान में तम्बाकू की दो किस्में प्रमुख हैं- 1.निकोटिना टुबेकम व 2. निकोटिना रास्टिका।
  • राजस्थान में तम्बाकू का सर्वाधिक उत्पादन अलवर जिले में होता है।
4.ग्वार- 
  • ग्वार कपड़ा उद्योग, श्रृंगार, विस्फोटक सामग्री बनाने के काम आता है।
  • ग्वार का उत्पादन बढ़ाने हेतु राजस्थान में दुर्गापुरा (जयपुर) स्थित कृषि अनुसंधान केन्द्र उन्नत किस्में तैयार करता है।
  • सबसे बड़ी ग्वार मण्डी जोधपुर में स्थित है तथा ग्वार गम उद्योग भी जोधपुर में सर्वाधिक है।
  • जोधपुर में ग्वार गम जाँच लैब स्थापित की गई है।
5. खजूर- 
  • खजूर में 70 से 75 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट होता है।
  • खजूर क्षारीयता सहन करने की क्षमता रखता है।
  • खजूर अनुसंधान केन्द्र बीकानेर में स्थित है। वर्तमान में बीकानेर क्षेत्र में खजूर की खेती की जाती है।
  • खजूर की प्रमुख किस्में हिवानी, मेंजुल, अरबी खजूर, बहरी, जाहिंदी आदि हैं।
  • खजूर में लगने वाला प्रमुख रोग ग्रोफियोला है।
  • देश की पहली व एशिया की दूसरी सबसे बड़ी खजूर पौध प्रयोगशाला जोधपुर के चोपासनी में स्थापित की गई है।
5.ईसबगोल(घोड़ा जीरा) -
  • ईसबगोल के प्रमुख उत्पादक जिले जालौर, बाड़मेर, सिरोही, नागौर, पाली तथा जोधपुर हैं।
  • विश्व का लगभग 80 प्रतिशत ईसबगोल भारत में पैदा होता है।
  • भारत का 40 प्रतिशत ईसबगोल जालौर जिले में पैदा होता है।
  • ईसबगोल का उपयोग औषधि निर्माण, कपड़ों की रंगाई छपाई, सौंदर्य प्रसाधन, फाइबर फूड के निर्माण में किया जाता है।
  • मण्डोर (जोधपुर) में स्थित कृषि अनुसंधान केन्द्र में ईसबगोल पर शोध कार्य किया जा रहा है।
  • राजस्थान में औषधीय महत्व की फसलों के होने वाले निर्यात में ईसबगोल का निर्यात सर्वाधिक होता है।
  • आबूरोड में ईसबगोल का कारखाना स्थापित किया गया है।
 7.जीरा- 
  • जीरा रबी की फसल है।
  • जीरे में होने वाले प्रमुख रोग छाछिया, झुलसा, उकटा आदि है।
  • जीरे की प्रमुख किस्में RS-1, SC-43 हैं।
  • जीरा उत्पादन व क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का देश में पहला स्थान है।
  • जीरा मुख्यत: जालौर जिले की भीनमाल, जसवंतपुरा व रानीवाड़ा तहसीलों में पैदा होता है।
  • राजस्थान में जीरे की सबसे बड़ी मंडी भदवासिया (जोधपुर) में स्थित है।
तिलहन (Oil Seeds)
  • तिलहन के उत्पादन में राजस्थान का उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान है।
  • राजस्थान में रबी की तिलहन फसलों में सरसों, राई, तारामीरा व अलसी तथा खरीफ की तिलहन फसलों में मूंगफली, सोयाबीन, तिल व अरंडी प्रमुख हैं।
  • राजस्थान में तिलहन के क्षेत्र में लगातार वृद्धि की प्रवृत्ति है।
1. सरसों- 
  • भारत विश्व में सर्वाधिक सरसों उत्पादन करता है। 
  • राजस्थान को सरसों का प्रदेश कहा जाता है।
  • राजस्थान देश का सर्वाधिक सरसों (30 प्रतिशत) उत्पादन एवं उत्पादकता क्षेत्र वाला राज्य है।
  • तिलहन की रबी फसलों में सर्वाधिक क्षेत्रफल सरसों का है।
  • सरसों के लिए शीत एवं शुष्क जलवायु, 15° से 20° सेन्टीग्रेड तापमान, 75 से 100 सेमी. वार्षिक वर्षा व हल्की चिकनी मिट्टी या दोमट मिट्टी उपयुक्त रहती है।
  • सरसों की प्रमुख किस्में वरुणा (सबसे उन्नत किस्म) , RH-819, RL-1359, बायो-902 तथा पूसा बोल्ड हैं।
  • सरसों में होने वाले प्रमुख रोग चेंपा (मस्टर्ड एसिड), तना गलन रोग, सफेद रौली तथा आल्टरनेरिया झुलसा हैं।
  • पीली क्रांति (पीत क्रांति) प्रमुखत: सरसों की क्रांति है। हरित क्रांति का सर्वाधिक प्रभाव तिलहनों में सरसों पर पड़ा।
  • राजस्थान में सरसों के प्रमुख उत्पादक जिले भरतपुर (सर्वाधिक), अलवर, जयपुर, गंगानगर, धौलपुर व सवाईमाधोपुर हैं।
  • सरसों से तेल निकालने के बाद बचने वाली लुगदी खल कहलाती है।
  • भरतपुर जिले के सेवर नामक स्थान पर आठवीं पंचवर्षीय योजना में 20 अक्टूबर, 1993 को केन्द्रीय सरसों अनुसंधान केन्द्र की स्थापना की गई।
  • राजस्थान की सबसे बड़ी सरसों मंडी सुमेरपुर (पाली) में स्थित है।
2.तिल-
  • तिल मुख्य रूप से खरीफ की फसल है। इसके लिए उष्ण एवं आर्द्र जलवायु उपयुक्त रहती है।
  • तिल के लिए 25° से 35° सेन्टीग्रेड तक तापमान एवं 50 से 100 सेमी. वार्षिक वर्षा की आवश्यकता रहती है।
  • तिल के लिए हल्की बलुई और दोमट मिट्टी जिसमें जीवांश की मात्रा हो उपयुक्त रहती है।
  • तिल के प्रमुख उत्पादक जिले पाली (सर्वाधिक) व नागौर हैं।
3.मूँगफली-
  • मूँगफली के लिए 30° से 35° सेन्टीग्रेट तापमान, 50 से 75 सेमी. वार्षिक वर्षा एवं केल्शियम युक्त मिट्टी, हल्की दोमट मिट्टी या हल्की काली मिट्टी उपयुक्त रहती है।
  • मूँगफली में टिक्का रोग, क्राउनरोट, कालरा, भूँग, सफेद लट आदि रोग लगते हैं।
  • मूँगफली के प्रमुख उत्पादक जिले जयपुर व बीकानेर हैं।
  • मूँगफली उत्पादन के कारण लूणकरणसर (बीकानेर) को राजस्थान का राजकोट कहा जाता है।
  • राजस्थान का देश में मूंगफली उत्पादन की दृष्टि से सातवां स्थान है।
4.सूरजमुखी-
  • सूरजमुखी खरीफ व रबी दोनों मौसम की फसल है।
  • सूरजमुखी के लिए 100 से 120 सेमी. वार्षिक वर्षा व पकने के लिए 135 दिनों की जरूरत रहती है।
  • सूरजमुखी के प्रमुख उत्पादक जिले गंगानगर, झालावाड़, कोटा, जोधपुर व बीकानेर हैं।
  • सूरजमुखी की प्रमुख किस्मेंMSH - 8, EC - 68415 है।
5. सोयाबीन (Glycine Mat)
  • सोयाबीन की फसल के लिए 15° से 34° सेन्टीग्रेड तापमान व 60 से 120 सेमी. वार्षिक वर्षा उपयुक्त रहती है।
  • सोयाबीन विश्व का सबसे सस्ता, सबसे आसान और सबसे अधिक प्रोटीन देने वाला स्त्रोत है।
  • खरीफ तिलहन के अंतर्गत राजस्थान में सर्वाधिक क्षेत्र में सोयाबीन की खेती की जाती है।
  • सोयाबीन के उत्पादन में राजस्थान का देश में चौथा स्थान है
  • सोयाबीन की प्रमुख किस्में T-1, पंजाब-1, मैक्स-13, गौरव, पूसा-16 आदि हैं।
6. अरण्डी-
  • अरण्डी उत्पादन में राजस्थान का देश में तीसरा स्थान है जबकि प्रथम स्थान गुजरात का है।
7. होहोबा-जोजोबा (सायमन्डेसिया चायनेन्सिम)-
  • होहोबा-जोजोबा एक विदेशी पादप है तथा इसे पीला सोना भी कहा जाता है।
  • यह खारे पानी व अधिक गर्मी को सहन करने वाला पौधा है।
  • होहोबा-जोजोबा प्रायः इजरायल, मैक्सिको, कैलिफोर्निया आदि देशों के रेगिस्तानी इलाकों में पाया जाता हैं।
  • राजस्थान में सर्वप्रथम यह पौधा 1965 में काजरी (जोधपुर) में इजरायल से लाया गया।
  • होहोबा-जोजोबा से प्राप्त तेल का उपयोग लुब्रिकेशन के रूप में, प्रसाधन सामग्री व चिपकाने वाले पदार्थों के निर्माण में किया जाता है।
  • एपोर्ज संस्थान द्वारा फतेहपुर (सीकर-70 हैक्टेयर) एवं ढंड (जयपुर-5.45 हैक्टेयर) में होहोबा-जोजोबा फार्म विकसित किए गए हैं।
  • बीकानेर के झज्जर में जोजोबा प्लांटेशन की राज्य की निजी क्षेत्र में सबसे बड़ी परियोजना शुरू की गई है।
8. जैतून-
  • हानिकारक कालेस्ट्रोल को नियंत्रित और कम करने में सहायक जैतून के खाद्य तेल उत्पादन हेतु राजस्थान में जैतून की खेती की जाती है।
  • राजस्थान में जैतून का पौधा इजरायल से लाया गया है।
  • जैतून को अमन का प्रतीक माना जाता है। जैतून की पत्तियां लेकर उड़ान भरता पक्षी संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रतीक चिह्न है।
 पुष्प (फूल) कृषि
  • पुष्कर (अजमेर)- राजस्थान सरकार द्वारा राज्य की प्रथम पुष्क मंडी पुष्कर (अजमेर) में विकसित की गई है। राज्य में दमश्क गुलाब (चैती गुलाब) अर्थात् देशी गुलाब की खेती पुष्कर, अजमेर में होती है। रोज इंडिया नामक गुलाब की विशिष्ट किस्म है।
  • खमनौर (राजसमंद)- यहाँ दमश्क/चैती गुलाब की जाती है। चैती गुलाब का इत्र सर्वश्रेष्ठ होता है।
  • खुशखेड़ा (अलवर)- यहाँ रीको द्वारा पुष्प पार्क स्थापित किया जा रहा है।
 महत्वपूर्ण तथ्य
  • राजस्थान में स्यालू खरीफ) की खेती वह खेती होती है जिसमें आषाढ़ में मक्का, बाजरा आदि की बुवाई कर आसोज (आश्विन) में काट लिया जाता है।
  • राजस्थान में उनालू (रबी) की खेती वह खेती है जिसमें कार्तिक में गेहूं, जौ आदि बुवाई करके चैत्र-वैशाख में काट लिया जाता है।
  • राजस्थान में दीपावली से पूर्व बोई गई खेती अगेती, अगावती व अंगातो कहलाती है और दीपावली के बाद मार्गशीर्ष माह में बोई गई खेती पछेती व पछांतो कहलाती है।
  • खेत जोतने से पहले खेत के झाड़-झंखाड़ साफ करने को सूड़ करना कहा जाता है।
  • राजस्थान में ईसबगोल, जीरा व टमाटर की खेती के लिए जालौर एवं सिरोही जिले प्रसिद्ध है। राज्य में धनिये की खेती बारां, कोटा, झालावाड़, बूंदी, सवाईमाधोपुर व जयपुर जिलों में की जाती है।
  • नागौर (ताउसर) पान मैथी (हरी मैथी) के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।
  • राजस्थान में कोटा जिला मसाला उत्पादन में अग्रणी है।
  • भारत में हरित क्रांति का एम.एस. स्वामीनाथन के प्रयासों से 1966-67 में प्रारंभ हुई।
  • राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर आदि जिलों में झूमिंग प्रणाली की वालरा खेती की जाती है।
  • राजस्थान राज्य सहकारी तिलहन उत्पादन संघ लिमिटेड (तिलम संघ) की स्थापना 1990 में की गई।
  • राज्य में तीन कृषि निर्यात क्षेत्र जोधपुर (ग्वार, मेहन्दी, मोठ, मसालों हेतु), कोटा (धनिया तथा औषधीय महत्व के पौधों हेतु) तथा गंगानगर में रसदार फल हेतु स्थापित किए गए हैं।


Friday, 15 September 2017

राजस्थान में राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्य जीव अभयारण्य (National Park and Wildlife sanctuaries in Rajasthan)

राजस्थान में राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्य जीव अभयारण्य (National Parks and Wildlife sanctuaries in Rajasthan)
  • केन्द्र सरकार द्वारा स्थापित किया गया पशु-पक्षियों का स्थल राष्ट्रीय उद्यान कहलाता है, जबकि राज्य सरकार द्वारा स्थापित किया गया स्थल अभयारण्य कहलाता है।
  • राजस्थान में 3 राष्ट्रीय उद्यान व 26 अभयारण्य हैं।
राष्ट्रीय उद्यान (National Parks)
1. रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान-
  • सवाईमाधोपुर जिले में स्थित इस अभयारण्य को 1 नवंबर,1980 को राज्य के प्रथम राष्ट्रीय उद्यान के रूप में घोषित किया गया।
  • इस उद्यान को1974 में बाघ परियोजना के अंतर्गत चयनित किया गया।
  • यह देश की सबसे कम क्षेत्रफल वाली बाघ परियोजना है।
  • यह उद्यान अरावली तथा विंध्याचल पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य 392 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है।
  • राष्ट्रीय स्मारक घोषित रणथंभौर दूर्ग इस उद्यान में स्थित है।
  • इस उद्यान में बाघ, बघेरा, चीतल, सांभर, नीलगाय, रीछ, जरख एवं चिंकारा पाए जाते हैं।
  • धौंक वृक्ष तथा ढाक वनस्पतियां इस उद्यान में पाई जाती है।
  • आरक्षित क्षेत्र घोषित हो जाने पर रणथंभौर बाघ परियोजना को रामगढ़ (बूंदी) अभयारण्य से जोड़ दिया गया है।
  • रणथंभौर उद्यान क्षेत्र में पदम तालाब, राजबाग, मलिक तालाब, गिलाई सागर, मानसरोवर एवं लाभपुर झीलें स्थित है।
2. केवलादेव (घना) राष्ट्रीय उद्यान-
  • एशिया में पक्षियों की सबसे बड़ी प्रणयस्थली, पक्षी प्रेमियों का तीर्थ, हिम पक्षियों का शीत बसेरा, पक्षियों का स्वर्ग आदि नामों से प्रसिद्ध यह उद्यान भारत के प्रमुख पर्यटन परिपथ 'सुनहरा त्रिकोण' (दिल्ली-आगरा-जयपुर) पर स्थित है।
  • 1981 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।
  • सन् 1985 में 29 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैले इस उद्यान को यूनेस्को द्वारा विश्व प्राकृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया गया।
  • यहां कामन क्रेन, दुर्लभ साइबेरियन सारस, गीज, पोयार्ड, लेपबिंग, बेगर्टल एवं रोजी पोलीकन नामक पक्षी पाए जाते हैं।
3. मुकन्दरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान-
  •  9 जनवरी, 2012 को इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।
  • यह कोटा व चितौड़गढ़ में 199.55 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है।
राजस्थान के अभयारण्य (Sanctuaries in Rajasthan)
1. सरिस्का वन्य जीव अभयारण्य-
  •  बाघ परियोजना हेतु 1978-79 में संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया।
  • यह राजस्थान की दूसरी बाघ परियोजना है जो दिल्ली-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 पर अलवर जिले में अरावली पर्वत माला से घिरा है।
  • इस अभयारण्य में शेर व बाघों के अलावा सांभर, चीतल, नीलगाय, चिंकारा, चौसिंगा, स्याहगोश, जंगली सूअर आदि वन्य जीव पाए जाते हैं।
  • इस अभयारण्य में नीलकंठ महादेव का मंदिर, लोकदेवता भर्तृहरि की तपोस्थली, पाण्डुपोल, हनुमान मंदिर एवं राजस्थान पर्यटन विकास निगम की होटल टाइगर डेन स्थित है।
  • यह अभयारण्य हरे कबूतरों के लिए प्रसिद्ध है।
2. राष्ट्रीय मरू उद्यान-
  • यह क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा अभ्यारण्य है।
  • मरूस्थल में प्राकृतिक वनस्पति को सुरक्षित रखने, वन्य प्राणियों को संरक्षण प्रदान करने और करोड़ों वर्षों से पृथ्वी के गर्भ में दबे हुए जीवाश्म को संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से 8 मई, 1981 को राष्ट्रीय मरू उद्यान की स्थापना की गई।
  • यह अभयारण्य जैसलमेर व बाड़मेर जिले के तीन हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।
  • यहां राजस्थान का राज्य पक्षी गोडावण (ग्रेट इंडियन वस्टर्ड) पाया जाता है।
  • इस अभयारण्य में प्रकृति के अद्भुत करिश्में के रूप में लाखों वर्ष पूर्व के सागरीय जीवन के 25 वुड फासिल विद्यमान हैं।
  • भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत पूर्ण संरक्षण प्राप्त राज्य पक्षी गोडावण इस अभयारण्य में स्वच्छंद निवास करता है।
  • आकलवुड फासिल पार्क इस अभयारण्य में स्थित है।
3. दर्रा वन्य जीव अभयारण्य-
  • यह अभयारण्य कोटा से 50 किलोमीटर दक्षिण में विंध्याचल पर्वत श्रृंखला में मुकन्दरा अथवा दर्रा की पहाड़ियों में विस्तृत है।
  • यहां सांभर, चीतल, नीलगाय, हिरण और जंगली सूअर पाए जाते हैं।
  • इस अभयारण्य के निकट गागरोन का किला, रांवठा महल, दर्रा के महत्वपूर्ण बाडोली के मन्दिर, अबली मीणी का महल एवं मन्दिरगढ़ के मन्दिर स्थित है।
  • यह अभयारण्य गागरोनी अथवा हीरामन तोतों के लिए प्रसिद्ध है।
4. कुम्भलगढ़ वन्य जीव अभयारण्य-
  • यह अभयारण्य अरावली पर्वत श्रृंखला के दक्षिणी भाग में उदयपुर, राजसमंद व पाली जिलों में फैला हुआ है।
  • इस अभयारण्य का क्षेत्रफल लगभग 586 वर्ग किमी. है।
  • यह अभयारण्य रीछ, भेड़ियों, जंगली सूअर व जंगली मुर्गों के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • इस अभयारण्य में चौसिंगा भी पाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में घंटेल कहा जाता है। यह ऐसा हिरण है जिसके नर के चार सींग होते हैं, यह केवल भारत में ही पाया जाता है।
  • इस अभयारण्य के सृजन का मुख्य उद्देश्य भेड़ियों का संरक्षण करना था।
  • बनास नदी का उद्गम स्थल यही अभ्यारण्य है।
5. जयसमंद वन्य जीव अभयारण्य-
  • इस अभयारण्य की स्थापना 1957 में की गई।
  • यह अभयारण्य उदयपुर से लगभग 52 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में जयसमंद झील क्षेत्र में वन्य जीवों की सुरक्षा हेतु स्थापित किया गया।
  • इस अभयारण्य में लकड़बग्घा, बघेरा, सियार, चीतल, चिंकारा, जंगली सूअर एवं नीलगाय पाए जाते हैं।
6. वनविहार अभयारण्य आगरा-
  • यह अभयारण्य आगरा-धौलपुर-मुम्बई राष्ट्रीय राजमार्ग पर 25.6 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है।
  • इस पर्वतीय अभयारण्य में सांभर, चीतल, नीलगाय, चिंकारा एवं मोर आदि वन्य जीव पाए जाते हैं।
7. सीतामाता अभयारण्य-
  • यह अभयारण्य प्रतापगढ़, चितौड़गढ़ व उदयपुर जिले में 423 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है।
  • राज्य सरकार ने सीतामाता धर्मस्थली के चारों तरफ सघन वन क्षेत्र के पारिस्थितिक, वानस्पतिक एवं वन्य जीवों के महत्व को देखते हुए सन् 1979 में इसे अभयारण्य घोषित किया गया।
  • आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित इस अभयारण्य में एन्टीलोप प्रजाति का दुर्लभ प्राणी चौसिंगा एवं उड़न गिलहरीयां पाई जाती हैं।
  • यह अभयारण्य क्षेत्र सागवान-बांस मिश्रित वनों की देश में उत्तर-पश्चिमी सीमा है।
8. नाहरगढ़ जैविक अभयारण्य- 
  • यह अभयारण्य जयपुर-दिल्ली राजमार्ग पर आमेर (जयपुर) के पास स्थित है।
  • इस जैविक अभयारण्य का मुख्य उद्देश्य वन्य जीवों का संरक्षण, वन्य जीवन संबंधी शिक्षा एवं शोध कार्य है।
  • यह अभयारण्य मुख्य रूप से चिंकारों के लिए प्रसिद्ध है।
  • यह राज्य का प्रथम जैविक अभयारण्य है।
  • यहां काले हिरण, जंगली भेड़िए,स्याहगोश आदि वन्य जीव मिलते हैं।
  • यह अभयारण्य नाहरगढ़ दुर्ग के पास स्थित है
 9. जमवा रामगढ़ वन्य जीव अभयारण्य-
  • यह वन्य जीव अभयारण्य जयपुर जिले में जमवारामगढ़ के पास लगभग 300 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है।
  • इस अभयारण्य में चिंकारा, नीलगाय, चीतल, लंगूर, मोर आदि वन्य जीव पाए जाते हैं।
 10. रामगढ़ विषधारी अभयारण्य-
  • बूंदी जिले में स्थित यह अभयारण्य 252.79 वर्ग किमी. में फैला हुआ है।
  •  यहां धौकड़ा वृक्ष मुख्य रूप से पाए जाते हैं।
  • बाघ परियोजना क्षेत्रों के अलावा राजस्थान में यह एकमात्र ऐसा अभयारण्य है जहां राष्ट्रीय पशु बाघ विचरण करते हैं।
  • इस अभयारण्य को रणथंभौर के बाघों का जच्चा केन्द्र कहा जाता है।
11. राष्ट्रीय चम्बल अभयारण्य- 
  • घड़ियालों की सुरक्षा के लिए कोटा जिले में चम्बल नदी पर तीन राज्यों राजस्थान, उत्तरप्रदेश एवं मध्यप्रदेश द्वारा इस संयुक्त अभयारण्य की स्थापना सन् 1978 में की गई।
12. गजनेर वन्य जीव अभयारण्य-
  • बीकानेर जिले में स्थित यह अभयारण्य पशु-पक्षियों की शरणस्थली है।
  • यह अभयारण्य बटसड़ पक्षी (इंपीरियल सेंडगाउज) के लिए विश्व प्रसिद्ध है।इसको रेत का तीतर भी कहते हैं।
13. फुलवारी की नाल अभयारण्य-
  • उदयपुर के पश्चिम में 160 किलोमीटर की दूरी पर आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित इस अभयारण्य की पहाड़ी से मानसी वाकल नदी का उद्गम होता है।
  • इस अभयारण्य में बाघ, बघेरा, चीतल, सांभर आदि वन्य जीव पाए जाते हैं।
14. भैंसरोड़गढ़ अभयारण्य (चितौड़गढ़)-
  • चितौड़गढ़-रावतभाटा मार्ग पर स्थित इस अभयारण्य की स्थापना 5 फरवरी, 1983 को की गई।
  • यह अभयारण्य घड़ियालों के लिए प्रसिद्ध है।
  • यह अभयारण्य एक लम्बी पट्टी के रूप में चम्बल एवं ब्राह्मणी नदियों के साथ फैला हुआ है।
15. बस्सी अभयारण्य-
  • चितौड़गढ़ से 22 किलोमीटर दूर बस्सी कस्बे से सटे इस वन क्षेत्र को 1988 में अभयारण्य घोषित किया गया।
  • यह अभयारण्य जंगली बाघों के लिए प्रसिद्ध है।
  • यहां बघेरा, सियार, जरख, भेड़िया, मगरमच्छ, कछुए तथा उदबिलाव पाए जाते हैं।
16. सज्जनगढ़ अभयारण्य-
  • उदयपुर रियासत के आखेट स्थल के लगभग 5.2 वर्ग किमी. वन क्षेत्र को सन् 1987 में अभयारण्य घोषित किया गया।
  • इस अभयारण्य में सांभर, चीतल, चिंकारा, नीलगाय, जंगली सूअर आदि वन्य जीव पाए जाते हैं।
17. शेरगढ़ अभयारण्य-
  • सन् 1983 में घोषित यह अभयारण्य बारां जिले में 98 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है।
  • इस अभयारण्य में सांभर, बघेरा, जरख, रीछ, लोमड़ी, चीतल आदि वन्य जीव पाए जाते हैं।
  • यह अभयारण्य सांपों का संरक्षण स्थल है
18. बंध बरेठा-
  • भरतपुर जिले स्थित यह अभयारण्य सन् 1985 में घोषित किया गया।
  • यह अभयारण्य पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है।
19. रावली टाडगढ़ अभयारण्य-
  • अजमेर, पाली तथा राजसमंद जिलों में स्थित यह अभयारण्य 1983 में घोषित किया गया।
  • यह अभयारण्य 495 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला हुआ है।
  • इस अभयारण्य में बघेरा, रीछ, जरख, नीलगाय, गीदड़ आदि वन्य जीव पाए जाते हैं।
20. केलादेवी अभयारण्य-
  • करौली जिले में स्थित सन् 1983 में घोषित यह अभयारण्य 676 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।
  • इस अभयारण्य में बघेरा, रीछ, जरख, सांभर एवं चीतल पाए जाते हैं।
21. तालछापर अभयारण्य-
  • चुरू जिले की सुजानगढ़ तहसील में स्थित यह अभयारण्य काले हिरणों व प्रवासी पक्षी कुरजाँ की शरणस्थली है।
  • वर्षा के मौसम में इस अभयारण्य में मोथा घास (मोचिया साइप्रस रोटन्डस) उगती है।
 22. मचिया सफारी पार्क-
  • जोधपुर जिले में स्थित इस अभयारण्य में चिंकारा, काले हिरण, नीलगाय आदि वन्य जीव पाए जाते हैं।
  • यह देश का प्रथम वानस्पतिक उद्यान है जहां प्राकृतिक वनस्पतियों को संरक्षण प्रदान किया जाता है।
23. मांउट आबू अभयारण्य- 
  • राजस्थान सरकार ने 1960 में सिरोही जिले में स्थित आबू पर्वत श्रृंखला के 112.98 वर्ग किमी. क्षेत्र को अभयारण्य घोषित किया गया।
  • इस अभयारण्य में जंगली मुर्गे एवं डिकिल्पटेरा आबूएन्सिस नामक पादप (विश्व में केवल आबू पर्वत पर ही) पाया जाता है।
  • स्ट्रोबिलेन्थस कैलोसस जिसे स्थानीय भाषा में कारा कहा जाता है, यहाँ पैदा होता है।
राजस्थान के शिकार प्रतिबंधित क्षेत्र
   
     राजस्थान सरकार ने वन्य जीव (सुरक्षा) अधिनियम, 1972 की धारा 37 के अंतर्गत ऐसे समस्त क्षेत्रों में विचरण करने वाले वन्य प्राणियों की सुरक्षा और संवर्धन हेतु आखेट निषिद्ध क्षेत्र एवं उनकी सीमाएं घोषित की है। 
प्रमुख आखेट निषिद्ध क्षेत्र निम्न हैं-
  1. डोली- जोधपुर
  2. गुढा बिश्नोई- जोधपुर
  3. फीटकाशनी- जोधपुर
  4. ढेंचू(देचू)- जोधपुर
  5. सांथीन- जोधपुर
  6. जम्भेश्वर जी- जोधपुर
  7. खेजड़ली- जोधपुर
  8. सौंखलिया- अजमेर
  9. गंगवाना- अजमेर
  10. टिलोरा- अजमेर
  11. मुकाम- बीकानेर
  12. दीयात्रा- बीकानेर
  13. देशनोक- बीकानेर
  14. जोडवीर- बीकानेर
  15. बज्जू- बीकानेर
  16. बर्डोद- अलवर
  17. जौड़िया- अलवर
  18. संथाल- जयपुर
  19. महलां- जयपुर
  20. बागीदोरा- बांसवाड़ा
  21. धोरीमन्ना- बाड़मेर
  22. जारोड़ा- नागौर
  23. रोटू- नागौर
  24. जवाई बांध- पाली
  25. कंवाल जी- सवाई माधोपुर
  26. सोरसन- बारां
  27. उज्जला- जैसलमेर
  28. रामदेवरा- जैसलमेर
  29. रानीपुरा- टोंक
  30. मैनाल- चितौड़गढ़
  31. कनक सागर- बूंदी
  32. सांचौर- जालौर
  33. सांवतसर-कोटसर - बीकानेर

    Sunday, 10 September 2017

    राजस्थान में वनस्पति (Vegetation in Rajasthan)

    राजस्थान में वनस्पति (Vegetation in Rajasthan)
    • सर्वप्रथम राष्ट्रीय वन नीति 1952 में घोषित की गई, जिसके अनुसार वनों के क्षेत्रफल को राज्य के 33.3 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया। 
    • वर्तमान में राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 9.54 प्रतिशत भाग पर वन है जबकि 1949-50 में यहां 13 प्रतिशत भाग पर वन थे।
    • राजस्थान में वनों को सर्वाधिक नुकसान ईंधन के लिए वन काटने से हुआ है।
    • राजस्थान के पश्चिमी भाग में वन, कांटेदार पेड़ों व झाड़ियों के रूप में हैं। 
    • राजस्थान का दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्र घने जंगलों व वन्य जीवों की दृष्टि से समृद्ध है।
    राजस्थान में वनों का वर्गीकरण-
    • राजस्थान में विभिन्न भागों में भूमि एवं जलवायु में भिन्नता के अनुसार वनस्पति में भी भिन्नता पाई जाती है।
    • राजस्थान में निम्नलिखित प्रकार की वनस्पतियां पायी जाती है-
    1. शुष्क सागवान वन-
    •  ये वन सामान्यतः गहरी मिट्टी वाले पठारी क्षेत्रों व अरावली पर्वतमाला के ढालों में पाये जाते हैं।
    • सागवान के वृक्ष औसतन 500 मीटर की ऊंचाई तक मिलते हैं।
    • ये वन मुख्यत: दक्षिणी राजस्थान में बांसवाड़ा (सर्वाधिक), डूंगरपुर, चितौड़गढ़, उदयपुर व कोटा जिलों में पाये जाते हैं।
    • यहां 75 से 110 सेमी. वार्षिक वर्षा होती है।
    • राज्य के कुल वन क्षेत्र के 6.87 प्रतिशत भाग पर ये वन फैले हुए हैं।
     2. उष्ण कटिबंधीय (मिश्रित पतझड़) वन-
    • ये वन 50 से 80 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में पाये जाते हैं।
    • ये वन अरावली पर्वतमाला में 770 मीटर की ऊंचाई तक मिलते हैं।
    • इन वनों में धोंकड़ा (धोंक), आम, बरगद, गूलर, नीम, तेंदू, बबूल, बहेड़ा, आंवला,बांस आदि वृक्ष पाए जाते हैं। राजस्थान में धोंकड़ा(धोंक) के वन सर्वाधिक है।
    3.  उपोष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन-
    • ये वन आबू पर्वत में 1000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाये जाते हैं। जहां वार्षिक वर्षा औसतन 150 सेमी. से अधिक रहती है।
    • इन वनों में मुख्यत: बांस, आम, सिरिस, जामुन, रोहिड़ा आदि के वृक्ष मिलते हैं।
    • ये वन राज्य के कुल वन क्षेत्र का 0.38 प्रतिशत भाग पर पाये जाते हैं।
    4. शुष्क वन-
    • ये वन राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी भाग के मरूस्थलीय क्षेत्रों में पाये जाते हैं।
    • इस क्षेत्र में वर्षा की कमी के कारण प्राकृतिक वनस्पति बहुत ही कम पायी जाती है।
    • इस क्षेत्र में खेजड़ी, रोहिड़ा, बैर, कैर, खजूर, फोग, थूहर, कींकर आदि वृक्ष एवं झाड़ियां पायी जाती है।
    • इस क्षेत्र में सेवण, धामण, मुराल आदि घास भी पायी जाती है। खेजड़ी का वृक्ष राजस्थान में बहुत उपयोगी होने के कारण इसे राजस्थान का कल्पवृक्ष कहा जाता है।
    5. खैर वन-
    • ये वन ज्यादातर राज्य के दक्षिणी-पूर्वी भाग में बारां, कोटा, बूंदी, झालावाड़ तथा अलवर जिलों में मिलते हैं।
    • ये राज्य के कुल वन क्षेत्र के लगभग 3 प्रतिशत भाग में पाये जाते हैं।
    • इस क्षेत्र में खैर के साथ घट बोर, धौक, झींझा, बीलपत्र तथा मैंडला के वृक्ष पाए जाते हैं।
    • खैर वनों को सेलेक्शन वन वर्ध्दन पद्धति से पनपाया जाता है।
    • कत्था खैर वृक्ष के तने से बनाया जाता है
    6. धौंक वन- 
    • इन वनों की लकड़ी ईंधन के रूप में उपयोग की जाती है।
    • राजस्थान के कुल वन क्षेत्र के लगभग आधे (58.19%) भाग पर धौंक वन पाये जाते हैं।
    • ये वन मध्य समुद्र से 240 मीटर से 750 मीटर की ऊंचाई तक पाये जाते हैं।
    • ये वन बूंदी, चितौड़गढ़, सवाईमाधोपुर, धौलपुर, करौली, अलवर, जयपुर, अजमेर, पाली, जालौर व सिरोही जिलों में पाये जाते हैं।
     7. ढाक वन- 
    • ये वन राज्य के कुल वन क्षेत्र के 1.5 प्रतिशत भाग पर पाये जाते हैं। इन वृक्षों के फूलों से केसरिया रंग बनाया जाता है।
     वनों को कानूनी व प्रशासनिक दृष्टि से, रखरखाव की दृष्टि से तीन भागों में वर्गीकृत किया गया हैं-
    1. आरक्षित (संरक्षित) वन-  ये वन राज्य सरकार के पूर्ण नियंत्रण में होते हैं, जहां लकड़ी काटना और पशुओं को चराना पूर्ण रूप से प्रतिबंधित होता है। राजस्थान के कुल वन क्षेत्र के लगभग 38.16 प्रतिशत भाग पर ये वन पाये जाते हैं। इस प्रकार के वनों में सामान्य रूप से राष्ट्रीय उद्यान व वन्य जीव अभयारण्य आते हैं। राज्य में सर्वाधिक संरक्षित वन उदयपुर जिले में पाए जाते हैं।
    2. सुरक्षित या रक्षित वन- इस प्रकार के वनों पर राज्य सरकार का नियंत्रण होता है, लेकिन इन वनों को काटने और पशुओं को घास चराने की अनुमति समय-समय पर दे दी जाती है। सर्वाधिक सुरक्षित वन बारां जिले में पाए जाते हैं। ये वन राज्य के कुल वन क्षेत्र के लगभग आधे (53.36 प्रतिशत) भाग पर पाए जाते हैं।
    3. अवर्गीकृत वन- इस प्रकार के वनों पर राज्य सरकार का नियंत्रण नहीं होने के कारण यह वन अपना विकास एवं उन्नति नहीं कर पाते हैं। ये वन राज्य के कुल वन क्षेत्र के लगभग 8.48 प्रतिशत भाग पर पाए जाते हैं, जो मुख्यतया मरूस्थलीय जिलों में स्थित है।
    घास
    • सेवण घास- जैसलमेर के उत्तर-पश्चिम में भुट्टेवाला (मोहनगढ़) एवं रामगढ़-जवाई का ताला क्षेत्रों में पाई जाने वाली पौष्टिक घास है जो मरुस्थल के विस्तार को रोकने में सहायक है। यह घास लाठी सीरीज क्षेत्र में पाई जाती है। इस घास का वैज्ञानिक नाम लसियुरूस सिडीक्रस है।
    • मोथा (लेमन) घास- यह सबसे सुगंधित घास है। यह घास घना पक्षी अभयारण्य में पक्षियों के भोजन का आधार है।
    • मोचिया साइप्रस रोटेन्डर्स- यह घास तालछापर अभ्यारण्य में पाई जाती है।
    • भरूत (सेन्फ्रस) घास- राजस्थान में पाई जाने वाली यह घास फैसलों में होने वाले मोल्या और जड़गांठ जैसे रोगों से होने वाले नुक़सान को रोकने में सक्षम है।
    • गाजर घास- अमेरिका से आयातित गेहूं के साथ इस घास के बीज भारत में आ गए। इस घास से जयपुर जिला सर्वाधिक प्रभावित है। इस घास को चर्म रोग एवं अस्थमा का वाहक माना जाता है
    • धामण(ट्राइडोक्स) घास-  यह घास मवेशियों की जीविका का मुख्य आधार है। यह घास दुधारू पशुओं के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
    • डाब-  नुकीले व धारदार पत्ते वाली यह घास ग्रहण के समय सूतक के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए खाद्य सामग्री के साथ घरों में रखी जाती है
    • खस घास- इस घास की जड़ों से सुगंधित तेल निकाला जाता है जो इत्र व शरबत बनाने में उपयोग किया जाता है। यह घास सवाईमाधोपुर, भरतपुर तथा टोंक जिलों में पाई जाती है।
    • पामारोजा व रोशाघास- तम्बाकू को सुगंधित बनाने के लिए इस घास के तेल का उपयोग किया जाता है।
    • बूर घास- बीकानेर में पाई जाने वाली इस घास से आसवन विधि द्वारा सुगंधित तेल प्राप्त किया जाता है। यह औषधीय महत्व की घास है। 
    राजस्थान के वृक्ष व अन्य सामग्री
    • बांस- राज्य के कुल वन क्षेत्र का 2.5 प्रतिशत भाग में बांस पाए जाते हैं। बांस उदयपुर, चितौड़गढ़, बारां वन मंडलों तथा आबू पर्वत पर मिलते हैं। बांस को आदिवासियों का हरा सोना कहा जाता है।
    • महुआ- इस पौधे के फूलों से देशी शराब बनाई जाती है। ये वृक्ष सिरोही, डूंगरपुर, उदयपुर व बांसवाड़ा जिलों में पाए जाते हैं।
    • कत्था- खैर वृक्ष के तने की छाल से बनाया जाता है। कत्थे के प्रमुख उत्पादक जिले उदयपुर, झालावाड़ तथा चितौड़गढ़ है।
    • सालर वृक्ष- इस वृक्ष की लकड़ी का उपयोग सामान पैकिंग करने में किया जाता है। ये वृक्ष सिरोही, उदयपुर, जोधपुर, अजमेर व जयपुर जिलों में पाए जाते हैं।
    • खींप- झाड़ीनुमा इस पौधे के खींपोली नामक फलियां लगती है।
    • एलोवेरा-  यह लिली प्रजाति का औषधीय पादप है जिसका प्रचलित नाम देशी ग्वार पाठा ( संस्कृत नाम- धृतकुमारी) है।
    • हींग- प्रतापगढ़ जिले की सर्वाधिक प्रसिद्ध हींग Ferula Assafoetida नामक झाड़ी की जड़ के रस से प्राप्त की जाती है।
    • गोंद- चौहटन (बाड़मेर) क्षेत्र का गोंद विश्व प्रसिद्ध है।
    • फोग- यह एक झाड़ी है इसके फूलों से फटका साग बनाया जाता है। इसके फूलों का स्थानीय नाम बाड़ीयो है।
    • राजस्थान की वन सम्पदा और पेड़-पौधों का सर्वप्रथम अन्वेषण 1832 में किया गया।
    • सवाई तेजसिंह ने 1947 में फोरेस्ट सेटलमेंट पुनरीक्षण पुस्तक (पीली किताब) तैयार करवाई।
    • स्मृति वन- झालाना (जयपुर) में स्थित वन क्षेत्र जिसका नाम 2006 में बदलकर श्री कर्पूर चन्द्र कुलिश स्मृति वन किया गया।
    • राज्य में कार्यशील जनसंख्या का 0.4 प्रतिशत भाग रोजगार की दृष्टि से वन सम्पदा पर निर्भर है।
    • राज्य में प्रति व्यक्ति वन क्षेत्र 0.06 प्रतिशत है।
    • राजस्थान में सर्वाधिक वन सम्पदा वाला जिला उदयपुर है यहां जिले के कुल भू-भाग का 30.86 प्रतिशत और राज्य के कुल वन क्षेत्र का 14.06 प्रतिशत भाग पर वन है।
    • राज्य में न्यूनतम वन क्षेत्र वाला जिला चुरू है यहां जिले के कुल भू-भाग का 0.42 प्रतिशत भाग और राज्य के कुल वन क्षेत्र का 0.22 प्रतिशत भाग पर वन है।
    • राज्य में कुल प्रादेशिक मण्डलो की संख्या 42 है तथा वन मण्डल 13 हैं।
    • जोधपुर क्षेत्रफल की दृष्टि से राज्य का सबसे बड़ा वन मण्डल है।
    • उदयपुर राज्य का सर्वाधिक वन क्षेत्र वाला वन मण्डल है।
    • राज्य वृक्ष खेजड़ी थार का कल्पवृक्ष कहलाता है। खेजड़ी राज्य में वन क्षेत्र के लगभग 65 प्रतिशत भाग में पाए जाते हैं।

    Wednesday, 30 August 2017

    राजस्थान की प्रमुख सिंचाई व नदी घाटी परियोजनाएं

    राजस्थान की प्रमुख सिंचाई व नदी घाटी परियोजनाएं
    • राजस्थान में देश के कुल सतही जल का मात्र 1.16 प्रतिशत जल उपलब्ध है।
    • इंदिरा गांधी नहर राजस्थान की सबसे बड़ी तथा महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजना है।
    • बीसलपुर बांध राज्य की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना है।
    • राज्य में न्यूनतम सिंचाई, सिंचित क्षेत्र के आधार पर चुरू में व राज्य के कुल सिंचित क्षेत्रफल के आधार पर राजसमंद जिले में तथा अधिकतम सिंचाई गंगानगर व हनुमानगढ़ में होती है।
    • राजस्थान में गेहूं की फसल का सिंचित क्षेत्र सर्वाधिक है। इसके पश्चात सरसों व कपास का स्थान आता है।
    राजस्थान में सिंचाई के प्रमुख साधन (Major sources of irrigation in Rajasthan)

    1. कुएं एवं नलकूप (Wells and Tubewells)
    • राज्य में कुओं एवं नलकूपों द्वारा सर्वाधिक सिंचाई (65.67 प्रतिशत) होती है।
    • कुओं एवं नलकूपों से सिंचाई जयपुर (सर्वाधिक), भरतपुर, अलवर, उदयपुर व अजमेर जिलों में होती है।
    • जैसलमेर के पूर्व में स्थित चन्दन नलकूप मीठे पानी का थार का घड़ा कहलाता है।
    2. नहरें ( Canals) 
    • भारत में सर्वाधिक सिंचाई नहरों द्वारा लगभग 39 प्रतिशत भाग पर होती है।
    • राजस्थान में 32.84 प्रतिशत क्षेत्र पर नहरों द्वारा सिंचाई एवं 1.02 प्रतिशत क्षेत्र पर अन्य साधनों द्वारा सिंचाई होती है।
    • राज्य में नहरों द्वारा सिंचाई श्रीगंगानगर ( सर्वाधिक), हनुमानगढ़, जैसलमेर, भरतपुर, कोटा, बूंदी, बारां, सिरोही, डूंगरपुर, बांसवाड़ा व चुरू जिलों में होती है।
    3. तालाब ( Ponds)
    • राजस्थान में तालाबों द्वारा 0.47 प्रतिशत सिंचाई होती है।
    • राजस्थान के दक्षिणी एवं दक्षिणी-पूर्वी भागों में तालाबों द्वारा सर्वाधिक सिंचाई होती है। 
    • भीलवाड़ा जिले में तालाबों द्वारा सर्वाधिक सिंचाई होती है। उदयपुर, पाली, राजसमंद, चितौड़गढ़, कोटा, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, बूंदी, टोंक आदि अन्य जिले है जहां तालाबों द्वारा सिंचाई होती है।
    • जैसलमेर में तालाबों के स्थान पर खड़ीन का उपयोग किया जाता है।
    राजस्थान में बहुउद्देशीय परियोजनाएं (Multi purpose Projects in Rajasthan)

    1. इन्दिरा गांधी नहर परियोजना (Indira Gandhi Canal Project) 
    • यह परियोजना विश्व की सबसे बड़ी (मानव निर्मित) सिंचाई परियोजना है।
    • इसे राजस्थान की मरू गंगा व जीवन रेखा भी कहा जाता है।
    • उद्गम स्थल- पंजाब में फिरोजपुर के निकट सतलज व व्यास नदियों के संगम पर बने हरिकै बैराज से।
    • इस परियोजना का शिलान्यास 20 मार्च,1958 को तत्कालीन गृहमंत्री श्री गोविन्द वल्लभ पंत ने किया।
    • आरम्भ में यह परियोजना राजस्थान नहर परियोजना कहलाती थी, लेकिन 2 नवंबर,1984 को इसका नाम बदलकर इन्दिरा गांधी नहर परियोजना रख दिया गया।
    • इस परियोजना का सुझाव बीकानेर रियासत के तत्कालीन सिंचाई इंजीनियर श्री कंवर सेन ने 1948 में अपने अध्ययन बीकानेर राज्य में पानी की आवश्यकताएं में भारत सरकार को दिया था।
    • इन्दिरा गांधी नहर परियोजना का मुख्य उद्देश्य रावी व व्यास नदियों के पानी को राजस्थान के पश्चिमी भाग में सिंचाई, पेयजल एवं अन्य उपयोग में लेने का है।
    • पूर्व उपराष्ट्रपति स्व. डा. एस. राधाकृष्णन ने 11 अक्टूबर, 1961 को नौरंगदेसर वितरिका से सर्वप्रथम जल प्रवाहित कर मरू भूमि के विकास की शुरुआत की गई।
    • इन्दिरा गांधी नहर परियोजना में सर्वाधिक कमाण्ड क्षेत्र क्रमशः जैसलमेर व बीकानेर जिले का है।
    • इन्दिरा गांधी नहर परियोजना के दो भाग हैं- राजस्थान फीडर व मुख्य नहर।
    • इस परियोजना को दो चरणों में बांटा गया है- 
    प्रथम चरण
    • परियोजना के प्रथम चरण के अन्तर्गत 204 किमी. लम्बी राजस्थान फीडर नहर पंजाब के हरिकै बैराज से लेकर हनुमानगढ़ के पास मसीतावाली गांव तक बनाई गई।
    • राजस्थान फीडर नहर की 170 किमी. लम्बाई पंजाब व हरियाणा में तथा शेष 34 किमी. राजस्थान में हैं।
    • इसके अलावा 189 किमी. मुख्य नहर मसीतावाली से लेकर छतरगढ़ तक तथा 3109 किमी. वितरिकाओं का निर्माण प्रथम चरण में किया गया।
    • राजस्थान फीडर की गहराई 21 फीट व राजस्थान की सीमा पर फीडर के तले की चौड़ाई 134 फीट है।
    • प्रथम चरण का समस्त कार्य 1992 में पूर्ण हो चुका है।
    द्वितीय चरण
    • परियोजना के द्वितीय चरण में 256 किमी. लम्बी मुख्य नहर (189 किमी. से 445 किमी. पूगल से जैसलमेर में मोहनगढ़ तक) तथा 5756 किमी. वितरिकाओं तथा 7 लिफ्ट नहरों के निर्माण का कार्य शामिल किया गया है।
    • द्वितीय चरण में वितरण प्रणाली की कुल प्रस्तावित लम्बाई 5959 किमी. है तथा कुल प्रस्तावित सिंचित क्षेत्र 14.10 हैक्टेयर है।
    • 256 किमी. मुख्य नहर का निर्माण कार्य दिसंबर,1986 में सम्पन्न हुआ।
    • 1 जनवरी, 1987 को मोहनगढ़ के समीप नहर के अंतिम छोर तक पानी पंहुच गया।
    • 1998 से इन्दिरा गांधी नहर परियोजना के द्वितीय चरण के अन्तर्गत वनारोपण व चरागाह विकास कार्यक्रम OECF संस्था (जापान) के आर्थिक सहयोग से चलाया जा रहा है।
    • इन्दिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र में वृक्षारोपण कार्य के लिए वन सेना का गठन किया गया है।
     इन्दिरा गांधी नहर परियोजना की लिफ्ट नहरें
    • इन्दिरा गांधी नहर परियोजना में कुल 9 लिफ्ट नहरें है जिनमें से 7 पूर्णतः निर्मित, 1 निर्माणाधीन विजय 1 प्रस्तावित है।
    • मुख्य नहर से एक बार में पानी को 60 मीटर उठाने के लिए लिफ्ट नहरों का निर्माण किया गया है।
    1. बीकानेर-लूणकरणसर लिफ्ट नहर- लाभान्वित जिले- श्रीगंगानगर व बीकानेर। नवीन नाम- कंवर सेन लिफ्ट नहर। इसे बीकानेर की जीवन रेखा कहा जाता है। यह सबसे लंबी लिफ्ट नहर है।
    2. साहवा लिफ्ट नहर- लाभान्वित जिले- हनुमानगढ़, बीकानेर, चुरू व झुंझुनूं। नवीन नाम- चौधरी कुम्भाराम लिफ्ट नहर। यह सहायक नहरों सहित सबसे लंबी लिफ्ट नहर है।
    3. गजनेर लिफ्ट नहर- लाभान्वित जिले- बीकानेर व नागौर। नवीन नाम- पन्नालाल बारूपाल लिफ्ट नहर।
    4. फलौदी लिफ्ट नहर- लाभान्वित जिले- बीकानेर, जोधपुर व जैसलमेर। नवीन नाम- गुरु जम्भेश्वर (जाम्भौजी) लिफ्ट नहर।
    5. कोलायत लिफ्ट नहर- लाभान्वित जिले- बीकानेर व जोधपुर। नवीन नाम- डॉ. करणी सिंह लिफ्ट नहर।
    6. पोकरण लिफ्ट नहर- लाभान्वित जिले- जैसलमेर व जोधपुर। नवीन नाम- जयनारायण व्यास लिफ्ट नहर।
    7. बांगडसर लिफ्ट नहर- लाभान्वित जिले- बीकानेर, जैसलमेर व बाड़मेर।
    • इन्दिरा गांधी नहर परियोजना की शाखाएं- रावतसर (हनुमानगढ़- इस परियोजना की पहली शाखा), शहीद बीरबल, पूगल, बिरसलपुर, दातोर (बीकानेर), सूरतगढ़ व अनूपगढ (श्रीगंगानगर), सागर मल गोपा, चारवण वाला (जैसलमेर)।
    • अत्यधिक जल प्लावन के कारण इन्दिरा गांधी नहर क्षेत्र में सेम (जल भराव) की समस्या उग्र रूप ले रही है जिसका उपचार भूमि में पर्याप्त मात्रा में जिप्सम का प्रयोग करना है।
    • इंडो-डच जल निकासी परियोजना- हनुमानगढ़ जिले में सेम से प्रभावित क्षेत्रों में जल निकासी हेतु नीदरलैंड के आर्थिक सहयोग से यह परियोजना चलाई जा रही है।
    2. भाखड़ा नांगल परियोजना-
    • यह राजस्थान, पंजाब व हरियाणा राज्यों की संयुक्त परियोजना है।
    • इस परियोजना में हिमाचल प्रदेश की हिस्सेदारी केवल जल विद्युत के उत्पादन में है।
    • भाखड़ा नांगल परियोजना में राजस्थान की हिस्सेदारी 15.2 प्रतिशत है।
    • यह परियोजना भारत की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना है।
    • इस परियोजना में सतलज नदी पर भाखड़ा व नांगल स्थानों पर दो बांध बनाए गए है-
    • 1.भाखड़ा बांध- सतलज नदी पर होशियारपुर जिले में भाखड़ा नामक स्थान पर इस बांध का निर्माण किया गया है।
    • यह बांध विश्व का दूसरा एवं एशिया का सबसे ऊंचा कंक्रीट निर्मित गुरुत्व सीधा बांध है।
    • इस बांध की आधारशिला 17 नवंबर, 1955 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने रखी एवं इसका निर्माण अमेरिकी बांध निर्माता हार्वे स्लोकेम के निर्देशन में अक्टूबर, 1962 में पूर्ण हुआ।
    • यह भारत का सबसे ऊंचा (225.55 मीटर) बांध है।
    • भाखड़ा बांध के पीछे बिलासपुर(हिमाचल प्रदेश) बने विशाल जलाशय का नाम गोविन्द सागर है।
    • पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस बांध को 'एक चमत्कारी विराट वस्तु' एवं बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं को आधुनिक भारत के मंदिर कहा।
    • 2. नांगल बांध- यह बांध1952 में बनकर तैयार हो गया था। भाखड़ा बांध से 12 किमी. दूर नांगल (रोपड़,पंजाब) नामक स्थान पर स्थित है।
    • मुख्य नहरें- सरहिंद नहर, नरवाना नहर, विस्त दोआब नहर।
    • इस परियोजना से राजस्थान में सर्वाधिक सिंचाई हनुमानगढ़ जिले में होती है।
    • इस परियोजना के अंतर्गत कोटड़ा, गंगुवाल व रोपड़ नामक स्थानों पर तीन विद्युत गृह स्थापित किए गए हैं।
     3. माही बजाज सागर परियोजना-
    • यह राजस्थान व गुजरात की संयुक्त परियोजना है।
    • इस योजना से राज्य के दक्षिणी ज़िलों (मुख्यत: डूंगरपुर बांसवाड़ा) में पेयजल एवं सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
    • इस परियोजना के निर्माण के लिए दोनों राज्यों के बीच 1966 में एक समझौता हुआ।
    • इस परियोजना में राजस्थान का 45 प्रतिशत तथा गुजरात का 55 प्रतिशत हिस्सा है।
    • इस परियोजना से सर्वाधिक लाभान्वित जिला बांसवाड़ा है।
    • माही बजाज सागर बांध बांसवाड़ा के बांदरखेड़ा नामक स्थान पर निर्मित 3109 मीटर लंबा बांध है। जिसे 1983 में बनाया गया।
    • परियोजना के द्वितीय चरण में कागदी पिकअप बांध का निर्माण किया गया।
    • गुजरात में माही नदी पर कडाना बांध बनाया गया है।
    • इस परियोजना में दो विद्युत इकाईयों का निर्माण किया गया है। इन इकाइयों की विद्युत उत्पादन क्षमता 140 मेगावाट है।
    • इस परियोजना द्वारा उत्पादित सम्पूर्ण विद्युत राजस्थान को मिलती है।
     4. व्यास परियोजना-
    • सतलज, रावी व व्यास नदियों के पानी का उपयोग करने हेतु पंजाब, हरियाणा व राजस्थान की सम्मिलित परियोजना है।
    • इस परियोजना में व्यास नदी पर हिमाचल प्रदेश में दो बांध बनाए गए हैं- 1. पंडोह बांध- इस बांध से व्यास सतलज लिंक परियोजना हेतु लिंक नहर निकाली गई है। 2.पोंग बांध- राजस्थान में रावी व्यास नदियों के पानी में अपने हिस्से का सर्वाधिक पानी इसी बांध से प्राप्त होता है।पोंग बांध का मुख्य उद्देश्य इन्दिरा गांधी नहर परियोजना को शीतकाल में जल की आपूर्ति करना है।
    • इस परियोजना के अन्तर्गत देहर में 990 मेगावाट तथा पोंग में 384 मेगावाट के विद्युत गृह स्थापित किए गए हैं। इनसे राजस्थान को क्रमशः 20 प्रतिशत तथा 59 प्रतिशत विद्युत प्राप्त होगी।
    • रावी- व्यास जल विवाद- राजीव गांधी लोंगोवाल समझौते के तहत रावी-व्यास नदी जल-विवाद का हल निकालने के लिए 26 जनवरी, 1986 को भारत सरकार ने इराडी आयोग का गठन किया जिससे राजस्थान के लिए 86 लाख एकड़ फुट पानी निर्धारित किया गया।
    • भारत व पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता से 19 सितंबर, 1960 को सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए जिसमें भारत को रावी, व्यास व सतलज नदियों का पूरा पानी उपयोग में लेने का अधिकार प्राप्त हुआ।
    • अन्तर्राज्यीय जल समझौता 1955- राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली एवं पंजाब राज्यों के बीच रावी-व्यास पानी के विभाजन के संबंध में समझौता हुआ। राजस्थान को 5.5 MAF (55 लाख एकड़ फुट) पानी प्राप्त हुआ।
    5. सिद्धमुख-नोहर सिंचाई परियोजना-
    • यूरोपियन आर्थिक समुदाय के आर्थिक सहयोग से प्रारंभ इस परियोजना का शिलान्यास 5 अक्टूबर, 1989 को राजीव गांधी द्वारा भिरानी गांव के समीप किया गया।
    • इस परियोजना से हनुमानगढ़ जिले की नोहर व भादरा तहसील तथा चुरू जिले की राजगढ़ व तारानगर तहसीलों के कुल 113 गांवों में सिंचाई की जा रही है।
    • पोकरण में परमाणु परीक्षण के बाद 1998 में यूरोपियन आर्थिक समुदाय की सहायता पर रोक लगाने के बाद इस परियोजना का संचालन 1999 में नाबार्ड के सहयोग से पुनः प्रारंभ किया गया।
    • इस परियोजना का लोकार्पण 12 जुलाई, 2002 को सोनिया गांधी द्वारा किया गया तथा परियोजना का नाम बदलकर राजीव गांधी सिद्धमुख-नोहर परियोजना कर दिया गया।
    6. नर्मदा परियोजना-
    • नर्मदा बांध परियोजना मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान की सम्मिलित परियोजना है।
    • इस परियोजना में सिंचाई केवल स्प्रिंकलर (फव्वारा) सिंचाई पद्धति द्वारा करने का प्रावधान है।
    • इस परियोजना से जालौर व बाड़मेर जिलों में पेयजल सुविधा उपलब्ध होगी।
    • नर्मदा जल विकास प्राधिकरण द्वारा नर्मदा जल में राजस्थान की हिस्सेदारी 0.50MAF निर्धारित की गई है। इस जल के उपयोग के लिए गुजरात के सरदार सरोवर बांध से नर्मदा नहर निकाली गई है जो 458 किमी. गुजरात में और राजस्थान में 74 किमी. लम्बी है।
    • इस नहर का पानी राजस्थान के जालौर जिले की सांचौर तहसील के सीलू गांव के समीप बने जीरो प्वाइंट तक 18 मार्च,2008 को पहुंच गया था।
    • राजस्थान इस परियोजना की प्रथम इकाई पर कुल लागत का 2.31 प्रतिशत तथा द्वितीय इकाई की कुल लागत का 11 प्रतिशत भाग वहन करेगा।
    7. बीसलपुर परियोजना-
    • इस परियोजना में बनास नदी पर टोंक जिले के टोडारायसिंह कस्बे से 13 किलोमीटर दूर बीसलपुर गांव के पास बीसलपुर बांध बनाया गया है।
    • यह एक कंक्रीट बांध है।
    • 1988-89 में शुरू की गई यह परियोजना राजस्थान की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना है।
    • इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य जयपुर, अजमेर, टोंक, ब्यावर, किशनगढ़, केकड़ी एवं रास्ते में आने वाले शहरों, कस्बों एवं गांवों को पेयजल उपलब्ध करवाना व टोंक जिले में 81,800 हैक्टेयर कृषि क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करवाना है।
    • बीसलपुर परियोजना के लिए नाबार्ड के ग्रामीण आधारभूत विकास कोष (RIDF) से आर्थिक सहायता प्राप्त हो रही है।
    8. जाखम परियोजना-
    • इस परियोजना का शुभारंभ 1962 में प्रतापगढ़ में छोटी सादड़ी के निकट अनूपपूरा गांव में जाखम नदी पर जाखम बांध बनाकर किया गया।
    • यह बांध राजस्थान का सबसे ऊंचा बांध है जिसकी ऊंचाई 81 मीटर है।
    • इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य धरियावद और प्रतापगढ़ के गांवों को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करवाना है।
    • जाखम बांध से 13 किलोमीटर दूर नागरिया गांव में एक पिकअप बांध बनाकर दायें व बायें किनारों से दो नहरें निकाली गई है।
    • इस परियोजना का निर्माण कार्य जनजाति उपयोजना के अन्तर्गत किया गया है।
    • मुख्य बांध पर 4.5 मेगावाट जल विद्युत बनाने की दो इकाइयां स्थापित की गई है जिनसे 9 मेगावाट बिजली पैदा होती है।
    9. चम्बल परियोजना-
    • चम्बल राजस्थान की सबसे बड़ी व निरन्तर बहने वाली नदी है। केन्द्रीय जल शक्ति व नौकायन आयोग ने 1950 में इस परियोजना को अन्तिम रूप दिया।
    10.ईसरदा बांध-
    • बनास नदी पर सवाईमाधोपुर जिले के ईसरदा गांव में यह बांध बनाया गया है जिससे जयपुर, टोंक और सवाईमाधोपुर जिलों को पेयजल तथा सवाईमाधोपुर जिले को सिंचाई सुविधा उपलब्ध होती है।
    11. पांचना बांध-
    • इस परियोजना में करौली के समीप भद्रावती, बरखेड़ा,अटा, भैसावट तथा माची (पांच नदियों) के संगम पर पांचना बांध बनाया गया है।
    • यह बालू मिट्टी से बना राजस्थान का सबसे बड़ा बांध है।
    • इसका निर्माण अमेरिका के आर्थिक सहयोग से किया गया है।
    • यह बांध भरतपुर, धौलपुर, करौली और सवाई माधोपुर जिलों में सिंचाई हेतु जल उपलब्ध कराता है।
    12. सोम-कमला-अम्बा सिंचाई परियोजना-
    • इस परियोजना का निर्माण डूंगरपुर जिले में किया गया है और इसका प्रमुख उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में सिंचाई सुविधा उपलब्ध करवाना है।
    13. बिलास सिंचाई परियोजना-
    • कोटा जिले में मानगढ़ गांव के पास बिलास नदी पर मिट्टी से बना बांध।
    14. छापी सिंचाई परियोजना- 
    • यह परियोजना झालावाड़ जिले की महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजना है।
    • यह झालावाड़ जिले की अकलेरा तहसील के दल्हनपुर गांव के पास परवन नदी की सहायक नदी छापी नदी पर स्थित परियोजना है।
    15. पीपलदा लिफ्ट सिंचाई परियोजना-
    • इस परियोजना से सवाईमाधोपुर जिले में चम्बल नदी पर बांध बनाकर सवाईमाधोपुर जिले की खण्डार तहसील को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
    16. जवाई बांध परियोजना-
    • इस बांध का निर्माण लूनी नदी की सहायक नदी जवाई नदी पर 1956 में किया गया है।
    • यह बांध पाली जिले एरिनपुरा रेलवे स्टेशन के पास स्थित है।
    • जवाई बांध मारवाड़ का अमृत सरोवर कहलाता है।
    • इस बांध से जोधपुर व पाली जिलों को पेयजल आपूर्ति की जाती है।
    • सेई परियोजना के अंतर्गत जवाई बांध में पानी की आवक बढ़ाने हेतु राजस्थान सरकार ने उदयपुर जिले की कोटड़ा तहसील में सेई बांध बनाकर एक सुरंग के माध्यम से इसका जल जवाई बांध में मिलाने का कार्य प्रारंभ किया।
    • जवाई बांध से जालौर व पाली जिले के 41 हजार हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई होती है।
    17. अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाएं-
    • धौलपुर जिले में पार्वती नदी पर 1959 में बांध बनाया गया।
    • ओरई परियोजना- चितौड़गढ़ जिले में भोपालपुरा गांव के समीप ओरई नदी पर यह बांध बनाया गया है तथा इससे चितौड़गढ़ व भीलवाड़ा जिलों में सिंचाई का लाभ मिलेगा।
    • नाकोड़ा बांध लूनी नदी पर बनाया गया।
    • अजान बांध भरतपुर जिले में गम्भीरी नदी पर बनाया गया है।
    • मोरेल बांध- मोरेल नदी पर जस्टाना कस्बे के निकट सवाईमाधोपुर जिले में यह बांध बनाया गया है।
    • परवन लिफ्ट व सावन भादो परियोजना कोटा जिले में स्थित है।
    • मानसी वाकल परियोजना- इस परियोजना के निर्माण में 70 प्रतिशत राजस्थान सरकार व 30 प्रतिशत हिन्दूस्तान जिंक लिमिटेड का योगदान रहेगा। इस परियोजना के तहत उदयपुर जिले की झाड़ोल तहसील के गोराणा गांव में मानसी वाकल बांध का निर्माण किया गया है।
    • पार्वती जल विद्युत परियोजना- यह राजस्थान व हिमाचल प्रदेश दोनों राज्यों की संयुक्त परियोजना है।
    • मेजा बांध- 1972 में भीलवाड़ा जिले के मांडलगढ़ कस्बे के निकट कोठारी नदी पर निर्मित बांध। इस बांध की पाल पर 'ग्रीन मांउट' नामक पार्क विकसित किया गया है।
    • बंध बरेठा बांध- 1897 में महाराजा रामसिंह के समय भरतपुर जिले की बयाना तहसील में कुंकन्द नदी को दो पहाड़ों के बीच रोककर यह बांध बनाया गया है। यह भरतपुर जिले का सबसे बड़ा बांध है तथा इस बांध से भरतपुर शहर को पेयजल आपूर्ति की जाती है।
    • उम्मेद सागर बांध- भीलवाड़ा जिले में स्थित है।
    • गरदड़ा बांध- बूंदी जिले में स्थित बांध।
    • पश्चिमी बनास योजना- सिरोही जिले की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना।
    राजस्थान की प्रमुख नहरें
    1. गंगनहर-
    • यह राजस्थान की पहली सिंचाई परियोजना मानी जाती है।
    • बीकानेर रियासत में महाराजा गंगा सिंह के शासन काल में 1922-27 की अवधि में गंगनहर का निर्माण हुआ।
    • गंगनहर सतलज नदी से फिरोजपुर, पंजाब के निकट हुसैनीवाला से निकाली गई है।
    • इस नहर से इन्दिरा गांधी फीडर तथा गंगनहर के बीच गंगनहर लिंक चैनल निकाली गई है।
    • इस नहर ने गंगानगर जिले के शुष्क भागों को फलों के उद्यान व खाद्यान्न भण्डार में बदल दिया है।
    2. गुड़गांव नहर-
    • इस नहर के निर्माण का उद्देश्य यमुना नदी के पानी का मानसून काल में उपयोग लेना है।
    • आखेला (दिल्ली) के पास यमुना नदी से यह नहर निकाली गई है।
    • यह नहर भरतपुर जिले की कांमा तहसील के जुरेरा गांव के समीप राजस्थान में प्रवेश करती है।
    • राजस्थान में इस नहर की लम्बाई 35 मील है।
    • इस नहर से भरतपुर जिले की कांमा व डीग तहसील में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी।

    Friday, 25 August 2017

    राजस्थान में झीलें (Lakes of Rajasthan)





    राजस्थान की झीलें (Lakes of Rajasthan)
    • राजस्थान में झीलों का पर्यटन, सिंचाई,लवण उत्पादन, मत्स्य पालन, जलवायु समीकरण एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान है।
    • राजस्थान में झीलें दो प्रकार की पाई जाती है- 1. खारे पानी की झीलें व 2. मीठे पानी की झीलें।
    खारे पानी की झीलें
    • टेथिस सागर के अवशेष आज भी सांभर, डीडवाना, पंचपदरा आदि खारे पानी की झीलों के रूप में विद्यमान है।
    • राजस्थान में खारे पानी की झीलें मुख्यत: उत्तरी- पश्चिमी मरूस्थलीय भाग में पाई जाती है।
    • राजस्थान में सर्वाधिक खारे पानी की झीलें नागौर जिले में स्थित है।
    • राजस्थान की झीलों में नमक अधिक मात्रा में पाये जाने का कारण यहां ग्रीष्म ऋतु में चलने वाली दक्षिणी- पश्चिमी मानसूनी हवाएं है। जो अपने साथ कच्छ की खाड़ी से सोडियम क्लोराइड के कणों को राजस्थान की ओर लाती है।
    • भूमिगत जल से लवण निर्माण में राजस्थान का देश में पहला स्थान है।
    सांभर झील (जयपुर)
    • भारत में खारे पानी की सबसे बड़ी यह झील जयपुर से 65 किमी. दूर फुलेरा के पास स्थित है।
    • जयपुर, नागौर व अजमेर तीन जिलों में सांभर झील का फैलाव है।
    • सांभर झील का प्रवाह क्षेत्रफल 5702 वर्ग किमी. है।
    • भारत के कुल नमक उत्पादन का 8.70% यहीं से उत्पादित होता है।
    • इस झील में खारी, मन्था,रुपनगढ़, खंडेला, मेढ़ा व सामोद नदियां आकर गिरती है।
    • इस झील के नमक में सोडियम क्लोराइड की मात्रा अधिक है, इसलिए यहां सोडियम सल्फेट संयंत्र की स्थापना हिन्दुस्तान साल्ट लिमिटेड की सहायक कंपनी सांभर साल्ट द्वारा की गई है।
    • सांभर झील को पर्यटन के क्षेत्र में रामसर साईट के नाम से जाना जाता है।
    • स्वेडाफ्रूटी व सालवेडोरा स्पीसीज नामक वनस्पति सांभर के जल में से खारेपन की मात्रा को कम करने में सहायक है।
     डीडवाना झील (नागौर)
    • यह नागौर जिले में डीडवाना नगर के निकट 4 किमी. लम्बी व 3-6 किमी. चौड़ी झील है।
    • इस झील का नमक खाने योग्य नहीं है।
    • यहां 1960 में राजस्थान स्टेट केमिकल वर्क्स नाम से दो उद्योग स्थापित किए गए हैं, जो सोडियम सल्फाइड एवं सोडियम सल्फेट का उत्पादन करते हैं। इस सोडियम का उपयोग कागज बनाने में किया जाता है।
    • ब्राईन- नमक बनाने के लिए क्यारियों में भरा गया लवणीय पानी जिसे सुखाकर नमक प्राप्त किया जाता है।
    पचपदरा झील (बाड़मेर)
    • यह झील बाड़मेर जिले में पंचपदरा नगर के पास स्थित है।
    • पंचा नामक भील द्वारा दलदल को सूखाकर इस झील का निर्माण किया गया था।
    • यहां पर खारापन जाति के लोगों द्वारा मोरली झाड़ी की टहनियों का उपयोग कर नमक के स्फटिक बनाये जाते हैं।
    • यह नमक उत्तम किस्म का होता है जिसमें 98% सोडियम क्लोराइड की मात्रा पाई जाती है।
    रैवासा झील (सीकर)
    • यह झील सीकर जिले में स्थित है।
    • इस झील को प्राचीन काल में नमक उत्पादन में सम्पूर्ण एशिया में जाना जाता था।
    • राजस्थान का इतिहास लिखने वाले लेखक कर्नल टॉड ने अपनी पुस्तक एंटीक्यूटीज आफ राजस्थान में रैवासा झील का उल्लेख किया है।
     अन्य खारे पानी की झीलें-
    • लूणकरणसर झील- बीकानेर में स्थित है।
    • फलौदी झील- जोधपुर में स्थित है।
    • कावोद झील- जैसलमेर में स्थित है।
    • तालछापर झील- चुरू में स्थित है।
    मीठे पानी की झीलें 

    जयसमंद(ढेबर) झील, उदयपुर
    • मेवाड़ के गहलोत वंश के शासक महाराजा जयसिंह ने सन् 1685 से 1691 ई. में उदयपुर शहर से लगभग 51 किमी. दक्षिण-पूर्व में गोमती नदी पर बांध बनवाकर जयसमंद झील का निर्माण करवाया गया।
    • राजस्थान की सबसे बड़ी कृत्रिम, मीठे पानी की झील है।
    • यह भारत की दूसरी सबसे बड़ी कृत्रिम झील है।(भारत की सबसे बड़ी कृत्रिम झील गोविंद सागर, भाखड़ा है।)
    • इसको ढेबर झील भी कहा जाता है।
    • इस झील के क्षेत्र में 7 छोटे-बड़े टापू है जिन पर भील व मीणा जाति के लोग रहते हैं।
    • बाबा का भांगड़ा इस झील का सबसे बड़ा टापू है और प्यारी सबसे छोटा टापू है।
    • इस झील में एक टापू पर आइसलैंड रिसोर्ट नामक होटल बनाया गया है।
    • जयसमंद झील के निकट एक पहाड़ी पर चित्रित हवामहल स्थित है।
    • इस झील के पास ही रुठी रानी का महल है।
    राजसमंद झील
    • इस झील का निर्माण सन् 1962 में महाराजा राजसिंह द्वारा गोमती नदी पर करवाया गया जो 1676 ई. में पूर्ण हुआ।
    • यह झील 6.5 किलोमीटर लंबी एवं 3 किलोमीटर चौड़ी है।
    • यह राज्य की एकमात्र ऐसी झील है जिस पर किसी जिले का नामकरण हुआ है।
    • इस झील का उत्तरी भाग नौ चौकी की पाल के नाम से प्रसिद्ध है। जहां संगमरमर के 25 शिलालेखों पर 1917 संस्कृत के श्लोकों में रणछोड़ भट्ट द्वारा मेवाड़ का इतिहास अंकित है।
    • यह विश्व की सबसे बड़ी राजप्रशस्ति है जिस पर मेवाड़ के शासकों का वर्णन है।
    • इस झील के किनारे घेवर माता का मंदिर स्थित है।
    पिछोला झील (उदयपुर)
    • इस झील का निर्माण राणा लाखा के शासक काल में 14वीं शताब्दी के अंत में पिछोला गांव में एक बंजारे ने करवाया।
    • इस झील का जीर्णोद्धार राणा उदय सिंह ने करवाया।
    • सिटी पैलेस/राजमहल का निर्माण महाराणा उदय सिंह ने पिछोला झील के किनारे करवाया।
    • इस झील पर निर्मित बांध का पुनर्निर्माण राणा भीमसिंह ने 1795 ई. में करवाया।
    • शाहजहां ने जहांगीर के खिलाफ विद्रोह के दौरान यहां स्थित महलों में शरण ली थी।
    • हल्दी घाटी के युद्ध से पूर्व मानसिंह और राणा प्रताप की मुलाकात पिछोला झील की पाल पर हुई थी।
    • ब्रिटिश इतिहासकार फर्ग्यूसन ने पिछोला झील की तुलना लंदन के विशाल विण्डसर महल से की है।
    • पिछोला झील को जलापूर्ति बुझड़ा एवं सीसारमा नदियों द्वारा होती हैं।
    • इस झील को वर्तमान में स्वरुप सागर झील की सहायता से फतहसागर झील से जोड़ा गया है।
    • पिछोला झील में दो टापुओं पर जग मंदिर और जग निवास महल बने हुए हैं। वर्तमान में ये दोनों राजस्थान पर्यटन विकास निगम के अधीन है तथा इन्हें होटल के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है।
    फतहसागर झील (उदयपुर)
    • इस झील का निर्माण महाराणा जयसिंह सन् 1978 ई. में करवाया।
    • अतिवृष्टि के कारण तहस-नहस हो जाने पर इसका पुनर्निर्माण महाराणा फतह सिंह द्वारा करवाए जाने के कारण यह फतहसागर झील कहलाई।
    • फतहसागर झील पर स्थित बांध की आधारशिला ड्यूक ऑफ कनाट ने रखी, जिस कारण यह बांध कनाट बांध कहलाया।
    • फतहसागर झील के मध्य में स्थित एक टापू पर नेहरू आइलैंड स्थित है।
    • सन् 1975 ई. में सौर वेधशाला की स्थापना इस झील में स्थित एक टापू पर की गई।
    • फतहसागर झील के नीचे सहेलियों की बाड़ी बाग स्थित है।
    • इस झील के किनारे स्थित मोती-मगरी पहाड़ी को महाराणा प्रताप स्मारक के रूप में विकसित किया गया है।
    • फतहसागर झील के दूसरे किनारे 1989 में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर द्वारा हलाला गांव में ग्रामीण शिल्प एवं लोक कला परिसर शिल्पग्राम का सृजन किया गया है।
    आनासागर झील (अजमेर)
    • अर्णोराज (अन्नाजी) ने सन् 1137 ई. में इस झील का निर्माण करवाया।
    • झील के किनारे मुगल बादशाह जहांगीर द्वारा निर्मित दौलत बाग को वर्तमान में सुभाष उद्यान कहते है।
    • इस झील पर शाहजहां ने बारहदरी (बारह दरवाजे) में से संगमरमर के पांच दर का निर्माण करवाया।
     फायसागर झील (अजमेर)
    • इंजीनियर फाय के निर्देशन में बांडी नदी पर बांध बनाकर अकाल राहत कार्यों के तहत इस झील का निर्माण सन् 1891-92 के दौरान करवाया गया।
    • इस झील में जलस्तर अधिक होने पर इसका जल आनासागर में भेज दिया जाता है।
     पुष्कर झील (अजमेर)
    • अजमेर से 13 किलोमीटर दूर पुष्कर में स्थित यह झील तीन ओर से पहाड़ियों से घिरी हुई है।
    • इस झील के किनारे ब्रह्माजी का मंदिर स्थित है।
    • गोकुल चन्द पारीक ने सन् 1752 ई. में ब्रह्माजी मंदिर को वर्तमान स्वरूप प्रदान किया।
    • राजा मानसिंह प्रथम द्वारा पुष्कर झील के किनारे मानमहल का निर्माण करवाया।
    • पुष्कर झील के किनारे स्थित 52 घाटो में से सबसे बड़ा घाट, गांधी घाट है, जिसे जनाना/महिला घाट भी कहा जाता है। इसका निर्माण मैडम मैरी द्वारा करवाया गया।
    • इंग्लैंड की महारानी मैडम मैरी 1911 ई. पुष्कर झील देखने आई।
    • प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को यहां विशाल पशु मेला भरता है।
     नक्की झील (मांउट आबू, सिरोही)
    • यह मांउट आबू (सिरोही) में स्थित राजस्थान की सबसे ऊंची (1200 मीटर) झील है।
    • टाड राक (चट्टान) जो वास्तविक मेंढ़क की तरह लगती है, इस झील के किनारे स्थित है।
    • नक्की झील के किनारे स्थित घुंघट निकाली स्त्री के आकार की चट्टान जिसे नन राक कहा जाता है।
    • इस झील के किनारे माउंट आबू पर्वत पर हाथी, चम्पा और राम झरोखा नामक गुफाएं स्थित है।
    • रघुनाथ जी का मंदिर इस झील के किनारे स्थित है।
    सिलीसेढ़ झील (अलवर)
    • यह झील अलवर से 12 किमी. दूरी पर 10.5 वर्ग किमी. क्षेत्रफल में विस्तृत है।
    • यहां पर अलवर के महाराजा विनयसिंह ने सन् 1845 में अपनी रानी शीला के लिए एक अद्भुत शाही महल व शिकारी लाज बनवाया था।
    बालसमंद झील (जोधपुर)
    • इस झील का निर्माण सन् 1159 में परिहार शासक बालक राव द्वारा करवाया गया।
    • इसकी लम्बाई 1 किलोमीटर तथा चौड़ाई 150 फीट है।
    कायलाना झील (जोधपुर)
    • जोधपुर के पश्चिम में स्थित इस झील का निर्माण 1872 में सर प्रताप ने करवाया।
    • यह झील जोधपुर शहर को पेयजल की आपूर्ति करने के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।
    कोलायत झील (बीकानेर)
    • जनश्रुति के अनुसार यहां कपिल मुनि का आश्रम था।
    • इस झील के किनारे प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा को मेला लगता है।
     अन्य महत्वपूर्ण झीलें-
    •  उदयसागर झील- उदयपुर में स्थित इस झील का निर्माण आयड़ नदी के पानी से होता है।
    • भोपाल सागर झील- चितौड़गढ़ में स्थित इस झील का निर्माण भोपाल सिंह ने करवाया।
    • जैतसागर झील- बूंदी में स्थित इस झील का निर्माण जैता मीणा ने करवाया।
    • नंदसमंद झील- इस को राजसमंद की जीवन रेखा कहा जाता है।
    • मोती झील- इस झील को भरतपुर की जीवन रेखा कहा जाता है।
    • सावन भादो झील- यह झील अचलगढ़ (सिरोही) में स्थित है।
    • तलवाड़ा झील- हनुमानगढ़ में स्थित यह झील घग्घर नदी के जल से भरती है।
    • गैब सागर झील- डूंगरपुर में स्थित है।
    • नवलखा झील- बूंदी में स्थित है।
    • घड़ीसर/गड़ीसर झील- यह झील जैसलमेर में स्थित है। इस झील का निर्माण रावल घड़सिंह अथवा घरसी द्वारा करवाया गया।
    • मानसरोवर एवं काडिला झील- झालावाड़ में स्थित ये झीलें असनावर के निकट मुकुन्दरा पर्वत श्रेणी में स्थित है। इन झीलों के जल का उपयोग मुख्यत: सिंचाई के लिए किया जाता है।

    Sunday, 20 August 2017

    राजस्थान की नदियां (Rivers of Rajasthan)

    राजस्थान की नदियां (Rivers of Rajasthan)
    • राज्य के लगभग 60 प्रतिशत भाग पर आंतरिक प्रवाह प्रणाली पायी जाती है।
    • चुरू और बीकानेर ऐसे दो जिले है जहां कोई नदी नहीं बहती है।
    • राज्य में केवल चम्बल तथा माही बारहमासी नदियां हैं।
    • सर्वाधिक जिलों में बहने वाली नदियां चम्बल, बनास लूनी है जो छः जिलों में बहती हैं।
    • राजस्थान की नदियों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है- (1) बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियां- चम्बल, बनास, बेड़च, बाणगंगा, कोठारी, कालीसिंध, खारी, गम्भीरी, पार्वती। (2) अरब सागर में गिरने वाली नदियां- माही, सोम, जाखम, लूनी, साबरमती, सूकड़ी। (3) आन्तरिक प्रवाह की नदियां- घग्घर, कान्तली, काकनी, साबी, मंथा।
    1. बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियां

    चम्बल
    • उपनाम- चर्मण्वती, कामधेनु तथा नित्यवाही नदी।
    • उद्गम स्थल- मध्यप्रदेश के महु के दक्षिण में मानपुर के समीप जनापाव पहाड़ी (विंध्याचल पर्वत) से निकलती हैं।
    • यह चौरासीगढ़ (चितौड़गढ़) के समीप राजस्थान में प्रवेश करती हैं।
    • आगरा (उत्तरप्रदेश) के इटावा के निकट मुरादगंज नामक स्थान पर यमुना में मिल जाती हैं।
    • इस नदी की कुल लम्बाई 966 किमी. है जिसमें से 135 किमी. राजस्थान में हैं।
    • यह राज्य में अपवाह क्षेत्र (19,500 किमी.) के अनुसार बहने वाली, सबसे अधिक लम्बी नदी है। जो राजस्थान के साथ सबसे अधिक लम्बी अन्तर्राज्यीय सीमा बनाती हैं।
    • चूलिया जल प्रपात- भैंसरोड़गढ़ (चितौड़गढ़) के समीप चम्बल में सर्वप्रथम बामनी नदी आकर गिरती है जहां पर चूलिया जल प्रपात (ऊंचाई 18 मीटर) स्थित है।
    • केशोरायपाटन (बूंदी) के पास इसका पाट अधिकतम एवं गहराई भी अधिक है।
    • रामेश्वरम (सवाई माधोपुर) स्थान पर चम्बल नदी के बाएं किनारे पर बनास और सीप नदियों का संगम होता है जो त्रिवेणी संगम कहलाता है।
    • यह राजस्थान की बारहमासी नदी है एवं इससे सर्वाधिक अवनालिका अपरदन होता है।
    • इस नदी पर मध्यप्रदेश में गांधी सागर बांध, चितौड़गढ़ में राणा प्रतापसागर बांध, कोटा में जवाहर सागर बांध और कोटा बैराज/कोटा बांध स्थित है जो जल विद्युत और सिंचाई के मुख्य स्त्रोत हैं।
    • राज्य को सर्वाधिक सतही जल चम्बल नदी से प्राप्त होता है।
    • यह नदी चितौड़गढ़, कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, करौली और धौलपुर जिलों में प्रवाहित होती हैं।
    चम्बल की सहायक नदियां- 
    • चम्बल दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर बहने वाली राजस्थान की सबसे प्रमुख व एकमात्र नदी है जिसकी सर्वाधिक सहायक नदियां हैं।
    • मध्यप्रदेश में मिलने वाली नदियां-  सीवान, रेटम व शिप्रा।
    • बामनी (ब्राह्मणी) - यह चितौड़गढ़ जिले के हरिपुरा गांव की पहाड़ियों से निकलती हैं तथा भैंसरोड़गढ़ के समीप चम्बल नदी में मिल जाती हैं।
    • गुजाली- यह मध्यप्रदेश के जाट गांव के पास से निकलकर चितौड़गढ़ के अरनिया गांव के पास चम्बल में मिल जाती हैं।
    • ईज नदी- भैंसरोड़गढ़ से निकलकर डाबी स्थान पर चम्बल में मिल जाती हैं।
    • मेज नदी- भीलवाड़ा जिले से निकलकर बूंदी में बहती हुई सीनपुर के निकट चम्बल में मिल जाती हैं।
    • चाकण नदी- यह बूंदी में कई छोटे-छोटे नालों से मिलकर बनती है जो सवाईमाधोपुर के करनपुरा गांव में चम्बल में मिल जाती हैं। जिस पर नैनवा (बूंदी) में चाकण बांध बना हुआ है।
    • अन्य सहायक नदियां- बनास, कालीसिंध, छोटी कालीसिंध, पार्वती, कुराल, परवन, निमाज आदि।
    बनास नदी
    • उपनाम- वन की आशा, वर्णनाशा व वशिष्टी।
    • उद्गम स्थल- खमनौर की पहाड़ियां (कुम्भलगढ़), राजसमंद।
    • कुल लम्बाई- 480 किमी.।
    • यह नदी राजसमंद, चितौड़गढ़, भीलवाड़ा, अजमेर, टोंक तथा सवाईमाधोपुर जिलों में बहती हुई सवाईमाधोपुर जिले के रामेश्वरम नामक स्थान पर चम्बल में मिल जाती है।
    • बनास नदी टोंक जिले में सर्पाकार बहती हैं।
    • त्रिवेणी संगम- बीगोद और मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) के बीच बनास,बेड़च,मेनाल नदियों का संगम होता है।
     सहायक नदियां-
    • टोंक जिले में देवली नामक स्थान पर बनास नदी में खारी नदी आकर गिरती हैं।
    • मेनाल नदी मांडलगढ़ की पहाड़ियों (भीलवाड़ा) से निकलती है।
    • मोरेल नदी का उद्गम स्थल चाकसू (जयपुर) से होता है। जयपुर व सवाईमाधोपुर की सीमा पर बहते हुए खण्डार के पास बनास नदी में मिल जाती है। मोरेल नदी की सहायक नदी ढूंढ है।
    • बीसलपुर बांध- बनास नदी पर टोंक जिले के टोडारायसिंह तहसील के बीसलपुर गांव में इस बांध का निर्माण विग्रहराज चतुर्थ ने करवाया। पेयजल की दृष्टि से बीसलपुर बांध राजस्थान का सबसे बड़ा बांध है।
    • यह नदी पूर्णतः राजस्थान में बहने वाली सबसे लंबी नदी है।
    • अन्य सहायक नदियां- कोठारी, खारी,बेड़च, मेनाल,माशी व मोरेल।
    कोठारी नदी
    • उद्गम स्थल- दिवेर की पहाड़ियां (कुम्भलगढ़, राजसमंद)।
    • समापन- भीलवाड़ा में बनास नदी में।
    • इस नदी पर मेजा बांध बनाकर भीलवाड़ा जिले की पेयजल समस्या का समाधान करने का प्रयास किया गया है।
    बेड़च नदी
    • उद्गम स्थल- गोगुंदा की पहाड़ियां (उदयपुर)।
    • यह नदी अपने उद्गम स्थल से उदयसागर झील तक आयड़ नदी के नाम से जानी जाती है उदयसागर से निकलने के बाद यह नदी बेड़च के नाम से जानी जाती हैं।
    • यह नदी मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) के निकट बिगोद नामक स्थान पर बनास में मिल जाती है।
    • बेड़च नदी के किनारे आयड़ (ताम्रयुगीन) सभ्यता मिली है।
    कालीसिंध नदी
    • उद्गम स्थल- मध्यप्रदेश के देवास जिले के बागली गांव से।
    • इस नदी का राजस्थान में प्रवेश झालावाड़ में एवं समापन कोटा के नौनेरा नामक स्थान पर चम्बल नदी में मिलने से होता है।
    • यह नदी राज्य में झालावाड़, कोटा एवं बारां की सीमा बनाती है।
    • गागरोन का किला आहू व कालीसिंध नदियों के संगम पर स्थित है।
    • सहायक नदियां-
    • आहू नदी- यह मध्यप्रदेश के शाजापुर जिले की महिन्दपुर तहसील से निकलकर झालावाड़ की पश्चिमी दिशा से नंदपुर में प्रवेश करती है। गागरोन के पास कालीसिंध में मिल जाती है।इसकी सहायता नदियां क्यासरी व पिपलाज है।
    • सामेला- आहू व कालीसिंध नदियों का संगम स्थल।
    • अन्य सहायक नदियां- रेवा व परवन है।
    पार्वती नदी
    • उद्गम स्थल- मध्यप्रदेश के विंध्याचल पर्वत की सिहोर की पहाड़ियां।
    • पार्वती बांध- धौलपुर जिले में पार्वती नदी पर निर्मित बांध।
    • करियाहट (बारां) में राजस्थान में प्रवेश करती है।
    • समापन- कोटा जिले में चम्बल नदी में मिल जाती है।
    बाणगंगा नदी
    • उद्गम स्थल- जयपुर जिले की बैराठ की पहाड़ियों से।
    • उपनाम- अर्जुन की गंगा, तालाबंदी।
    • समापन- आगरा के फतेहाबाद नामक स्थान पर यमुना नदी में मिल जाने पर। इस नदी पर जमवारामगढ़ (जयपुर) में रामगढ़ बांध बनाया गया है जिससे जयपुर को पेयजल की आपूर्ति होती है।
    • बाणगंगा नदी कभी-कभी आन्तरिक प्रवाह प्रणाली का उदाहरण पेश करती है क्योंकि इसका पानी भी यमुना तक नहीं पहुंचती है और भरतपुर के आसपास के मैदानों में फैल जाता है। बाणगंगा चम्बल की रुण्डित नदी है।
    खारी नदी
    • उद्गम स्थल- राजसमंद के बिजराल गांव की पहाड़ियों से।
    • समापन- टोंक जिले के देवली नामक स्थान पर बनास में मिल जाती है।
    • भीलवाड़ा जिले की शाहपुरा तहसील में मानसी नदी खारी नदी में मिलती है। मानसी नदी भीलवाड़ा जिले की मांडल तहसील से निकलती है। यह नदी राजसमंद, भीलवाड़ा, अजमेर तथा टोंक जिले में प्रवाहित होती है।
    गम्भीरी नदी
    • इस नदी पर निम्बाहेड़ा (चितौड़गढ़) में गम्भीरी बांध बनाया गया है।
    • समापन- चितौड़गढ़ के चटियावली नामक स्थान पर बेड़च में।
    सोहदरा नदी
    • उद्गम स्थल- अजमेर जिले के दक्षिण में स्थित अराय गांव की पहाड़ियों से।
    • समापन- टोंक जिले में दूदिया गांव के पास माशी नदी में।
    • यह नदी टोरड़ी सागर बांध को भरती है।
    कुनु नदी
    • उद्गम स्थल- गुना शहर (मध्यप्रदेश)।
    • राज्य की एकमात्र नदी जो बारां जिले में स्थित मुसेड़ी गांव व कोटा जिले में स्थित गोवर्धनपुरा गांव में दो बार प्रवेश करती है।
    2. अरब सागर में गिरने वाली नदियां
    • ये नदियां सामान्यतः अरावली के दक्षिण-पश्चिम में बहती हुई अपना जल अरब सागर में ले जाती है।
    माही नदी
    •  उपनाम- दक्षिणी राजस्थान की स्वर्ण रेखा, बांगड़ व कांठल की गंगा, आदिवासियों की गंगा।
    •  उद्गम स्थल- मध्यप्रदेश में धार जिले के सरदारपुरा के निकट विंध्याचल की पहाड़ियों में स्थित मेहद झील से।
    • राजस्थान में प्रवेश- खांदू गांव (बांसवाड़ा) के निकट। यह नदी तीन राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान व गुजरात में बहती है।
    • समापन- गुजरात में खम्भात की खाड़ी में। गुजरात में इस नदी का प्रवेश पंचमहल जिले में रामपुर के पास।
    • त्रिवेणी संगम- यह नदी डूंगरपुर जिले में बेणेश्वर नामक स्थान पर सोम और जाखम नदियां मिलकर त्रिवेणी संगम बनाती है। इस स्थान पर माघ पूर्णिमा को मेला भरता है।जिसे आदिवासियों का कुंभ कहा जाता है।
    • कुल लम्बाई- 576 किमी. है जबकि राजस्थान में इसकी लम्बाई 171 किमी. है।
    • राज्य के बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ में बहने वाली यह नदी डूंगरपुर व बांसवाड़ा के मध्य प्राकृतिक सीमा बनाती है।
    • यह नदी दक्षिणी राजस्थान में मध्य माही का मैदान बनाती है जिसे छप्पन का मैदान कहा जाता है।
    • यह नदी कर्क रेखा को दो बार काटती है।
    • बांसवाड़ा के लोहारिया गांव के निकट माही बजाज सागर बांध एवं कागदी पिकअप बांध बोरखेड़ा स्थान तथा कडाना बांध गुजरात के पंचमहल जिले में निर्मित है।
    • सहायक नदियां- 
    • सोम नदी- उद्गम स्थल- उदयपुर जिले की बीछामेड़ा की पहाड़ियां।समापन- डूंगरपुर में माही नदी में। इसकी सहायक नदियां जाखम, गोमती व सारनी।
    • जाखम नदी- यह नदी प्रतापगढ़ जिले में छोटी सादड़ी के निकट भंवरमाता की पहाड़ियों से निकलती है।समापन- धरियावद (प्रतापगढ़) में सोम नदी में।जाखम बांध- छोटी सादड़ी में जाखम नदी पर निर्मित बांध।
    • अन्य सहायक नदियां- मोरन, ऐराव,चाप, अन्नास व इरू।
    लूनी नदी
    •  उपनाम- आधी मिठी और आधी खारी नदी, मारवाड़ की जीवन रेखा, लवणवती तथा मरूस्थल की गंगा।
    •  उद्गम स्थल- नाग पहाड़, अजमेर।
    • यह नदी अजमेर, नागौर, पाली, जोधपुर, बाड़मेर तथा जालौर जिलों में बहती हुई गुजरात में प्रवेश कर कच्छ के रण में विलीन हो जाती है।
    • अरावली के पश्चिम में बहने वाली प्रमुख नदी जिसका पानी बालोतरा (बाड़मेर) के बाद खारा हो जाता है।
    • कुल लम्बाई- 330 किमी.।
    • महाकवि कालिदास ने लूनी को अंत: सलिला कहा है।
    • मरुस्थलीय क्षेत्र की एकमात्र समन्वित जल प्रवाह प्रणाली है।
    • पश्चिमी राजस्थान की सबसे लंबी नदी।
    • उद्गम स्थल से इसका नाम सागरमती बाद में सरस्वती और अन्त में लूनी नदी हो जाती है।
    • सहायक नदियां- 
    • जवाई नदी- बाली (पाली) के निकट गोरियां गांव। समापन- बालोतरा (बाड़मेर) में लूनी नदी में। पाली में इस नदी पर जवाई बांध बनाया गया है।
    • सूकड़ी नदी-  यह नदी अरावली से निकलकर पाली तथा जालौर जिलों में बहती हुई माजल-बरवा के निकट बाड़मेर जिले में प्रवेश करती है। समदड़ी के पास बाड़मेर में लूनी नदी में मिल जाती है।
    •  मीठड़ी नदी- यह नदी पाली की अरावली की पहाड़ियों से निकलकर बाड़मेर जिले में मंगला नामक स्थान के पास लूनी नदी में मिलती है।
    • लीलड़ी नदी- पाली की अरावली की पहाड़ियों से निकलकर निम्बोल नामक स्थान के पास लूनी नदी में मिल जाती है।
    • जोजड़ी नदी- नागौर जिले के पोंडलू गांव की पहाड़ियों से निकलकर जोधपुर में दक्षिण-पश्चिम में बहती हुई बाड़मेर जिले के सीवाना नामक स्थान पर लूनी नदी में मिल जाती है। यह नदी अरावली श्रेणी से नहीं निकलती है तथा लूनी नदी में पश्चिम दिशा (दायीं ओर) से मिलने वाली एकमात्र नदी है।
    • बाडी नदी- यह नदी पाली जिले से निकलकर जोधपुर जिले की सीमा पर लूनी नदी में मिलती है।
    साबरमती नदी

    •  उद्गम स्थल- उदयपुर जिले की कोटड़ी गांव की दक्षिणी-पश्चिमी अरावली पहाड़ियां।
    • समापन- खम्भात की खाड़ी में (अधिकतर प्रवाह क्षेत्र गुजरात में)।
    • गुजरात के गांधीनगर एवं अहमदाबाद शहर इसी नदी के तट पर बसे हुए हैं।
    • राजस्थान से निकलकर गुजरात जाने वाली साबरमती नदी पर देवास प्रथम एवं देवास द्वितीय नामक दो बांध बनाये गए हैं। इन बांधों का पानी सुरंग के द्वारा उदयपुर की झीलों में पहुंचेगा।
    • सहायक नदियां- मेस्ता, वेतरक, हथमती, वाकल व जाजम।
    पश्चिमी बनास
    • उद्गम स्थल- सिरोही जिले के नया सनवारा गांव की पहाड़ियों से।
    • समापन- कच्छ की खाड़ी में।
    • सिपू नदी- पश्चिमी बनास की सबसे महत्वपूर्ण सहायक नदी है। आबू रोड (सिरोही) एवं गुजरात का डिसा शहर सिपू नदी के किनारे स्थित है।
     3. आंतरिक प्रवाह की नदियां
    • ये नदियां अपना जल किसी समुद्र में नहीं ले जाती है और न ही इनकी कोई सहायक नदियां होती है तथा ये कुछ भू-भाग पर प्रवाहित होकर विलीन या विलुप्त हो जाती है।
    • राज्य के लगभग 60 प्रतिशत भू-भाग पर आंतरिक प्रवाह प्रणाली पाई जाती है।
    घग्घर नदी
    • उपनाम- प्राचीन सरस्वती या द्रष्द्वती नदी, मृत नदी, सोतरा नदी, राजस्थान का शोक।
    • यह नदी वैदिक संस्कृति की सरस्वती नदी के पेटे में बहती है।
    • यह राजस्थान में आंतरिक प्रवाह की सबसे लंबी नदी है।
    • उद्गम स्थल- कालका के पास हिमालय की शिवालिक पहाड़ियां (शिमला, हिमालय प्रदेश)।
    • राजस्थान में प्रवेश- हनुमानगढ़ जिले की टिब्बी तहसील के तलवाड़ा नामक स्थान पर।
    • किसी समय घग्घर नदी उफान पर होती तो तलवाड़ा, अनूपगढ और सूरतगढ़ होती हुई भारत पाकिस्तान सीमा को पार कर फोर्ट अब्बास (पाकिस्तान) तक चली जाती थी एवं यहां यह हकरा नाम से जानी जाती थी।
    • हनुमानगढ़ में स्थित भटनेर दुर्ग घग्घर नदी के तट पर स्थित है।
    • नाली- हनुमानगढ़ में घग्घर नदी के पाट को नाली कहा जाता है।
    • कालीबंगा- सिंधु घाटी सभ्यता का प्रमुख केन्द्र इस नदी के किनारे स्थित है।
    काकनी नदी
    • उपनाम- मसूरदी/काकनेय।
    • उद्गम स्थल- कोटारी (जैसलमेर)
    • बुझ झील- काकनी नदी जैसलमेर में इस झील का निर्माण करती है।
     कांतली नदी
    • उद्गम स्थल- खण्डेला की पहाड़ियां (सीकर)।
    • तोरावाटी- इस नदी का बहाव क्षेत्र।
    • समापन- झुंझुनूं-चुरू की सीमा पर।
    • सीकर में स्थित गणेश्वर सभ्यता का विकास इस नदी के तट पर हुआ।
    साबी नदी
    • उद्गम स्थल- जयपुर व सीकर की सीमा पर स्थित सेवर की पहाड़ियों से निकलकर अलवर में प्रवाहित होकर पटौदी के मैदान में विलीन हो जाती है।
    मंथा नदी
    • उद्गम स्थल- मनोहरपुर (जयपुर)।
    • समापन- सांभर झील।
    रुपारेल नदी
    • उद्गम स्थल- अलवर जिले में थानागाजी तहसील की उदयनाथ पहाड़ियों से।
    • सरिस्का क्षेत्र तथा अलवर के दक्षिण में बहती हुई भरतपुर जिले में गोपालगढ़ के निकट प्रवेश करती है।
    • यह नदी भरतपुर जिले में विलुप्त हो जाती है।
    • इसे वराह तथा लसवारी भी कहा जाता है।
    महत्वपूर्ण तथ्य
    • अरावली के उत्तर-पश्चिम भाग में अधिकतर आंतरिक जल प्रवाह प्रणाली पाई जाती है।
    • राजस्थान में भारत के कुल सतही जल का मात्र 1.16% ही है।
    • राज्य की दक्षिणी-पूर्वी नदियां बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
    • राज्य में सर्वाधिक नदियां कोटा संभाग में प्रवाहित होती है जबकि न्यूनतम नदियों वाला संभाग बीकानेर है।
    • चितौड़गढ़ जिले में सर्वाधिक नदियां बहती हैं जबकि बीकानेर व चुरू जिलों में कोई नदी नहीं बहती है।

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